स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद काशी में बोले - 'अंगद का पैर' धर्म और सत्य का प्रतीक, सत्ता का नहीं
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यूपी सरकार और अमित शाह के 'अंगद के पैर' वाले बयान पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा ...और पढ़ें

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का योगी सरकार पर हमला: 'अंगद का पैर' सत्ता नहीं, धर्म का प्रतीक।
HighLights
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने यूपी सरकार की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल।
अमित शाह के 'अंगद के पैर' बयान पर जताई गहरी आपत्ति।
'अंगद का पैर' धर्म और सत्य का प्रतीक, सत्ता का नहीं।
जागरण संवाददाता, वाराणसी: ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति और शासन प्रणाली को लेकर एक तीखा बयान दिया है। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा राज्य सरकार की स्थिति की तुलना 'अंगद के पैर' से किए जाने पर गहरी आपत्ति जताई है। शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि योगी आदित्यनाथ के शासन की तुलना किसी भी स्थिति में 'रामराज्य' से नहीं की जा सकती।
गुजरात प्रस्थान से पूर्व श्रीकाशी में अपने प्रवचन के दौरान पत्रकारों और संतों को संबोधित करते हुए कहा कि राजनीतिक लोग अपनी सुविधा के अनुसार धर्म-ग्रंथों के प्रसंगों और रूपकों का उपयोग करते हैं, जो धर्म का आदर नहीं बल्कि उसका अति-सरलीकरण है।
'अंगद का पैर' धर्म और सत्य का प्रतीक, सत्ता का नहीं
गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि त्रेतायुग में रावण की सभा में अंगद का पैर किसी राजनैतिक दंभ, अहंकार या सत्ता के बल पर नहीं जमा था। वह पैर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के धर्म, सत्य और न्याय की नीति के आधार पर स्थिर हुआ था। इसलिए आज की राजनीतिक परिस्थितियों में इस तरह के पौराणिक और आध्यात्मिक प्रतीकों का उपयोग करना और शासन के बल को 'अंगद का पैर' बताना उचित नहीं है।
शासन व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल
अविमुक्तेश्वरानंद ने उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिस शासन में बटुकों की चोटी खींची जाती हो, संतों पर निर्ममता से प्रहार किए जाते हों और लाखों गौमाता की उपेक्षा या कटवाने की स्थिति बनती हो, ऐसे शासन को 'रामराज्य' की संज्ञा देना पूरी तरह अनुचित है। रामराज्य का आधार सत्य, अहिंसा, करुणा, और सभी जीवों की रक्षा होता है, जबकि वर्तमान में इसके विपरीत स्थितियां देखने को मिल रही हैं।
मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने इस आशय की जानकारी देते हुए बताया कि स्पष्ट किया है कि संतों और धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक मंचों पर अपनी सुविधा के अनुसार महिमामंडन करना उचित नहीं है। जनता सब जानती है और धर्म के नाम पर शासन की कमियों को छुपाया नहीं जा सकता। श्रीकाशी से गुजरात यात्रा के लिए रवाना होने से पहले दिए गए इस बयान से राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर बहस छिड़ गई है।
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