काशी में गंगा की मिट्टी और उपले की आंच से संवर रही दीपावली की आस्था, गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों को मिल रहा है आकार
काशी में दीपावली के लिए सुरेश प्रजापति का परिवार छह पीढ़ियों से गंगा की मिट्टी और उपले की आंच से ...और पढ़ें
HighLights
गंगा की मिट्टी से बनती हैं गणेश-लक्ष्मी मूर्तियां।
सुरेश प्रजापति का परिवार छह पीढ़ियों से कर रहा निर्माण।
चाइनीज मूर्तियों से बेहतर, शुद्धता और परंपरा का प्रतीक।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी, जो अपनी प्राचीन परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और अटूट आस्था के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहां हर पर्व का रंग बेहद अनूठा होता है। बात चाहे देव दीपावली की हो या दीपावली के पावन पर्व की, काशी की हर गली में आस्था जीवंत हो उठती है। प्रकाश के इस महापर्व पर घर-घर में पूजे जाने वाले विघ्नहर्ता भगवान गणेश और धन की देवी माता लक्ष्मी की मूर्तियां इन दिनों शहर में एक खास अंदाज में आकार ले रही हैं।
छह पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और कारीगरी
वाराणसी के चेतगंज स्थित तुलसी कुआँ काली महाल रोड पर सुरेश प्रजापति अपने पूरे परिवार के साथ इस पारंपरिक कार्य को निभा रहे हैं। सुरेश प्रजापति का परिवार करीब छह पीढ़ियों से इस मूर्ति कला के कारोबार से जुड़ा हुआ है।
बनारस में यूं तो कई स्थानों पर मूर्तियां बनाई जाती हैं, लेकिन इस परिवार की कारीगरी और नक्काशी की बात ही कुछ और है। यही वजह है कि इनकी बनाई मूर्तियों की मांग बाजार में सबसे ज्यादा रहती है। सुरेश प्रजापति मुख्य रूप से पांच अलग-अलग आकारों (साइज़) में आकर्षक और मनमोहक मूर्तियां तैयार करते हैं।
चाइनीज मूर्तियों को दे रही हैं कड़ी टक्कर
आज के दौर में बाजार में विदेशी और चाइनीज उत्पादों की भरमार है, लेकिन सुरेश और उनके परिवार का मानना है कि चाइनीज मूर्तियों से उनका कोई मुकाबला नहीं है। बनारस के लोग अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़े रहना पसंद करते हैं, इसलिए स्थानीय लोग बनारस में ही बनी मूर्तियों की खरीदारी को प्राथमिकता देते हैं।
सुरेश का अनुभव बताता है कि जो ग्राहक या दुकानदार एक बार चीन में बनी मूर्तियां खरीद लेते हैं, वे दोबारा उनकी तरफ रुख नहीं करते। इसकी मुख्य वजह यह है कि चाइनीज मूर्तियों में पवित्रता और शुद्धता का अभाव होता है, साथ ही वे पारंपरिक मूर्तियों की तुलना में महंगी भी होती हैं। इसके विपरीत, बनारस की बनी मूर्तियां आस्था और शुद्धता की मिसाल पेश करती हैं।
शुद्धता ही है पहचान: गंगा की मिट्टी और उपले की आंच
इन मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी निर्माण प्रक्रिया में छिपी है। यहां की मूर्तियां पूरी तरह से पवित्र मानी जाने वाली गंगा की मिट्टी से गढ़ी जाती हैं और पारंपरिक रूप से उपले की आग में पकाई जाती हैं। यही वजह है कि शुद्धता ही इन मूर्तियों की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है और काशीवासी इन्हें बेहद श्रद्धा के साथ अपने घरों में स्थापित करते हैं।
चैत्र नवरात्रि से शुरू हो जाती है तैयारी
दीपावली पर चमकने वाली इन मूर्तियों की तैयारी रातों-रात नहीं होती। इसके पीछे महीनों की कड़ी मेहनत और लगन छिपी होती है। इन मूर्तियों के निर्माण की शुरुआत चैत्र नवरात्रि से ही हो जाती है, और तब जाकर दीपावली के पावन अवसर तक गणेश-लक्ष्मी के ये पावन रूप पूरी तरह से तैयार हो पाते हैं।
इस पुश्तैनी कार्य में सुरेश प्रजापति अकेले नहीं हैं, बल्कि उनके परिवार के सभी सदस्य कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करते हैं। परिवार में सुरेश जी के अलावा उनकी पत्नी चंदा देवी, अमित प्रजापति, शालू, नीलम और अनिल सभी मिलकर पूरे समर्पण भाव से इन मूर्तियों को गढ़ने और संवारने का कार्य करते हैं।
काशी की यह माटी और इन कलाकरों के हुनर की महक सिर्फ बनारस ही नहीं, बल्कि लोगों के घरों तक मां लक्ष्मी की कृपा और उल्लास का संदेश लेकर पहुंच रही है।
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