वाराणसी, जेएनएन। परंपराओं के शहर बनारस में  कोरोना की बंदिशों के बीच शुक्रवार को गुलाबबाड़ी की महफिल सजेगी। श्वेत धवल कुर्ता-पाजामा, गुलाबी साड़ी, सिर पर दुपलिया टोपी और गले में गुलाबी दुपट्टा के साथ ही मुंह पर मास्क होगा। ठंडई छनेगी और रिश्तों को गरमजोशी देखते बनेगी लेकिन शारीरिक दूरी के साथ। कोविड-19 से बचाव संबंधित दिशा-निर्देशों की पालन करते हुए लाल गुलाब की पंखुड़ियां बिखरेंगी और महफिल गीत-ंसंगीत से निखरेगी। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधीन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आइसीसीआर) व पं. रामसहाय संगीत फाउंडेशन की ओर से शुक्रवार शाम 5.30 बजे कबीर मठ के नजदीक गुरुकुल में गुलाबबाड़ी मनाई जाएगी।

खास यह कि बनारस की परंपरा से जुड़े इस आयोजन में में ही भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का स्थापना उत्सव व तबला सम्राट पं. शारदा सहाय का 86वां जन्मोत्सव भी मना लिया जाएगा। संगीतत्रयी सत्र  में पं. पुण्डलिक कृष्ण भागवत का तबला वादन होगा तो डा. बी सत्यावर मृदंगम की थाप से दंग करेंगे। डा. अंकित पारिख इस खास प्रस्तुति में पखावज वादन  से रंग भरेंगे। ठुमरी साम्राज्ञी पद्मविभूषण गिरिजा देवी के युवा शिष्य रोहुल-रोहित मिश्र सधे सुर लगाएंगे और ठुमरी-दादरा समेत सांगीतिक विविधता की सुमधुर सुर गंगा में गोता लगवाएंगे। इसके अलावा उस्ताद अकरम खान का एकल तबला वादन होगा। इस दौरान हारमोनियम पर पं. धर्मनाथ मिश्र, तबला पर आनंद मिश्र, सारंगी पर अनीश मिश्रा संगत करेंगे।

दरअसल, काशी में ऋतु अनुसार संगीत महफिल की परंपरा रही है। इसमें  होली के बाद चैत माह बेहद खास होता है। रंग पर्व के ठीक दूसरे मंगल को बुढ़वा मंगल की गंगधार में सज्जित बजड़े पर महफिल सजती है तो महमह गुलाब की पंखुड़ियों के बीच चैती के रंग भी निखर जाते हैं। हालांकि कोरोना संकट के कारण इस बार बुढ़वा मंगल की परंपरा टूट गई तो चैती बैठक यानी गुलाबबाड़ी को लेकर भी संशय ही था लेकिन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद व पं. रामसहाय संगीत फाउंडेशन की ओर से पहली बार इसका आयोजन किया जा रहा है। युवा शास्त्रीय गायक पं. राहुल-रोहित मिश्र कहते हैं कि गुलाबबाड़ी बनारस की  प्राचीन परंपरा है। गुरुजनों और संगीत रसिकों ने इसे सहेजा और यहां तक लाए। अब इसे संभाल कर रखना और आगे ले जाना हमारी जिम्मेदारी है। कोरोना संकट के बीच वह रंगत तो नहीं दिखेगी लेकिन सुर-साज का रंग तो सतरंगी ही होगा। दरअसल,  जब ऋतु परिवर्तन होता है तब चैती गुलाब और संगीत के बीच इस तरह का आयोजन बनारस की पुरातन परंपरा है। इसमें हमारी संस्कृति रची-बसी है।

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