वाराणसी, जेएनएन। रामचरित मानस की प्रतियां दुनिया भर में फैली हुई हैं। अभी रामचरित की वे प्रतियां ही नहीं मिली हैं जो भारत में हैं। ऐसे में दुनिया के दूसरे देशों की बात ही छोड़िए। भारत में पांडुलिपि तो छोड़िए बहुत सारे अभिलेख ऐसे हैं जो अभी पढ़े ही नहीं गए हैं। यह कहना है जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. ओम प्रकाश सिंह का। वह शनिवार को बीएचयू स्थित भोजपुरी अध्ययन केंद्र में 'रामचरितमानस की पाडुलिपिया' नामक पुस्तक के लोकार्पण व परिचर्चा को मुख्य वक्ता के तौर पर संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन भोजपुरी अध्ययन केंद्र, बीएचयू व आधार प्रकाशन, चंडीगढ़ की ओर से किया गया।

प्रो. सिंह ने कहा कि रामचरितमानस की पाडुलिपिया पुस्तक बहुत श्रमपूर्वक लिखी गई किताब है। अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के रेक्टर प्रो. वीके शुक्ल ने कहा कि यह पुस्तक रामचरितमानस के संदर्भ में उठे विवादों का निस्तारण करते हुए एक मजबूत पाठ तैयार करती है। मुख्य अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि 'रामचरितमानस की पाडुलिपिया' तमाम ज्ञात अज्ञात तथ्यों के आधार पर तैयार की गई हैं। पाठभेद संपादन में आने वाली सबसे बड़ी बाधा होती है। इस पुस्तक में उस समस्या का निराकरण किया गया है।

पुस्तक के संपादक उदय शंकर दुबे ने कहा कि पाडुलिपियों का संग्रह करना एक मुश्किल काम है। पुस्तक के लेखक व बीएचयू के न्यूरो चिकित्सक प्रो. विजय नाथ मिश्र ने कहा कि रामचरितमानस की सैकड़ों पाडुलिपियों को देखते हुए उनमे सहमति-असहमति का विश्लेषण इस पुस्तक में किया गया है। स्वागत भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, संचालन प्रो. चंपा सिंह व धन्यवाद ज्ञापन डा. शिल्पा सिंह ने किया। इस अवसर पर प्रो. अखिलेश कुमार, प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, शेफाली आभा, रामनगर रामलीला के व्यास हनुमान पाडेय आदि समेत छात्र-छात्राएं मौजूद थीं।

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