वाराणसी, जेएनएन। 'गाड़ी की कीमत से ज्यादा रेलवे का वारफेज चार्ज' ये बात सुनने में अजीब जरूर लगता है, लेकिन रेल मैनुअल में कुछ भी संभव है। यहां स्थान शुल्क के नाम पर होने वाली वसूली ने अब तक बड़े- बड़ों के होश फाख्ता कर दिए हैं। कुछ ऐसी व्यवस्था 'वारफेज शुल्क, के शिकार लोगों ने अपनी गाडिय़ां ही छोड़ दी। अपने स्वामियों के इंतजार में ये गाडिय़ा कैंट स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर पांच स्थित पार्सल शेड में खड़े- खड़े कबाड़ हो चुकी है।

क्या है वारफेज चार्ज

रेल मैनुअल के तहत पार्सल विभाग की तरफ से प्लेटफार्म और गोदाम में स्थान उपलब्ध कराने के नाम पर वाहन स्वामियों से वारफेज शुल्क वसूलने की प्रक्रिया है। पार्सल शेड में खड़ी 17 गाडिय़ां उन्हीं में शामिल है। कुछ गाडिय़ां 24 साल, कुछ 22 साल, कुछ 15 तो कुछ 10 साल से खड़ी है। ये गाडिय़ा ट्रेनों से बुक कर मंगाई गई थी। लेकिन चार्ज बढऩे के कारण वाहन स्वामियों ने उसे छोड़ दिया।

वाहनों के निस्तारण की है आस

प्लेटफार्म नंबर पांच स्थित पार्सल शेड में खड़ी गाडिय़ा कबाड़ हो चुकी है। इसके कारण फैली गंदगी कर्मचारियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। वहीं जगह के अभाव में सामान को शेड के बाहर ही रखना पड़ रहा है। विभागीय स्तर पर वाहनों के निस्तारण के लिए संभागीय परिवहन विभाग को कई बार पत्राचार किया गया। लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। इस उदासीनता के कारण अब तक वाहनों को नीलाम नही किया जा सका।

मालखाने में एक बंडल कारतूस

एक बंडल कारतूस पार्सल विभाग के मालखाने की शोभा बढ़ा रहा है। 25 साल पहले वर्ष 1995 में बुक कारतूस को कोई लेने नहीं आया। समयसीमा बीत जाने के बावजूद कारतूस का निस्तारण अब तक नहीं किया जा सका। विभागीय कर्मचारियों के अनुसार इन्हें नष्ट करने की अनुमति हेतु कई बार जीआरपी और सेना को पत्राचार किया जा चुका है। इस बारे में कैंट स्टेशन के मुख्य पार्सल पर्यवेक्षक अरुण कुमार गुप्ता के अनुसार वाहनों के निस्तारण के लिए संभागीय परिवहन विभाग से कई बार पत्राचार किया जा चुका है। लेकिन अब तक अनुमति नहीं मिली।

 

Posted By: Saurabh Chakravarty

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