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बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में तीन नवंबर को निर्मला सीतारमण करेंगी स्मारक सिक्का का लोकार्पण

By Vns Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
Published: Sun, 01 Nov 2026 03:51 PM (IST)

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 3 नवंबर को बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में कर्नाटक संगीतज्ञ मुथुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती ...और पढ़ें

निर्मला सीतारमण 3 नवंबर को वाराणसी में जारी करेंगी मुथुस्वामी दीक्षितर स्मारक सिक्का।

निर्मला सीतारमण 3 नवंबर को वाराणसी में जारी करेंगी मुथुस्वामी दीक्षितर स्मारक सिक्का।

HighLights

  1. निर्मला सीतारमण करेंगी मुथुस्वामी दीक्षितर स्मारक सिक्का जारी।

  2. आईआईटी बीएचयू में भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र का उद्घाटन।

  3. कर्नाटक संगीतज्ञ को समर्पित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी होंगी।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। कर्नाटक संगीत के महान संगीतज्ञ मुथुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती पर भारत सरकार तीन नवंबर को उनके सम्मान में स्मारक सिक्का जारी करेगी। आइआइटी बीएचयू के भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र (सीओई-आइकेएस) की ओर से बीएचयू के स्वतंत्रता भवन में आयोजित समारोह में केंद्रीय वित्त एवं कारपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण सिक्के का लोकार्पण करेंगी। सिक्का शाम 3:58 से 4:20 बजे के बीच जारी किया जाएगा।

आयोजन की शुरुआत दोपहर 2:15 बजे भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र के उद्घाटन से होगी। इसके बाद मुख्य अतिथि स्वतंत्रता भवन पहुंचेंगी। दीप प्रज्ज्वलन और महामना पं. मदन मोहन मालवीय को श्रद्धांजलि के बाद वैदिक मंत्रोच्चार और कुलगीत की प्रस्तुति होगी। आइआइटी बीएचयू के निदेशक मुख्य अतिथि का अभिनंदन करेंगे।

सांगीतिक प्रस्तुतियों के क्रम में डा. सुमित्रा वासुदेव कर्नाटक शास्त्रीय गायन से मुथुस्वामी दीक्षितर को स्वरांजलि देंगी। इसके बाद रमना बालचंद्रन वीणा वादन करेंगे। उनके साथ मृदंगम पर गणपति रमन और वायलिन पर एल. रामकृष्णन संगत करेंगे। दोनों प्रस्तुतियां क्रमशः 35-35 मिनट की होंगी।

बीएचयू के कुलपति के संबोधन के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री स्मारक सिक्का जारी करेंगी और संबोधित करेंगी। इसके बाद आइआइटी बीएचयू के निदेशक का संबोधन होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा उत्कृष्टता केंद्र के समन्वयक के धन्यवाद ज्ञापन के साथ वंदेमातरम और राष्ट्रगान होगा।

मुथुस्वामी दीक्षितर कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति में शामिल थे। उनकी रचनाओं में संस्कृत, भारतीय दर्शन और शास्त्रीय रागों का अनूठा समन्वय मिलता है। उनके जीवन और संगीत पर काशी प्रवास की भी गहरी छाप रही।

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