'आंच' की शूटिंग के लिए नाना पाटेकर काशी आए और साग से लेकर बाटी चोखा के लिए संतोष को मुंबई साथ ले गए
नाना पाटेकर के संवादों ने बनारस के लोगों के दिलों में खास जगह बनाई है, जहां उनकी फिल्मों 'क्रांतिवीर' और ...और पढ़ें

नाना पाटेकर और बनारस का गहरा रिश्ता फिल्मों और यादगार संवादों के जरिए।
HighLights
नाना पाटेकर के संवाद बनारस में रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बने।
'आंच' और 'जर्नी' फिल्मों की शूटिंग के लिए काशी आए।
संतोष मूरत सिंह को मुंबई ले गए, बनारसी स्वाद चखाया।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। हर समय मस्त-मौला रहने वाला यह शहर किसी एक चेहरे के लिए देर तक ठहरता कम ही है, मगर आठ अक्टूबर की सुबह कुछ अलग थी। लोग उठे तो मोबाइल पर एक ही चेहरा छाया हुआ था। वह चेहरा था नाना पाटेकर का। पर्दे पर किसी किरदार में उतरते तो उसे भूल पाना आसान नहीं रहता था।
नाना चले गए थे, लेकिन उनके किरदारों की आवाज सुबह से बनारस की गलियों में जैसे गूंज रही थी। हर दूसरे फोन पर एक स्टेटस लगा था 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने।' नाना के संवादों में ऐसी खनक थी, जो पर्दे से निकलकर सीधे आम आदमी की बातचीत में पहुंच जाती थी। बनारस ने भी उनके कई किरदार देखे, डायलाग सुने और उनमें से कुछ को अपनी रोजमर्रा की हंसी-मजाक का हिस्सा बना लिया। शायद यही किसी कलाकार के शहर के दिल में उतर जाने का अपना ढंग होता है, और नाना इसमें माहिर थे।
'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने' बना बच्चों का डायलाग
बंगाली टोला निवासी सौरभ सेन बताते है उन्हें सुशील सिनेमा हाल का वह दौर आज भी याद है। नाना पाटेकर की ‘क्रांतिवीर’ फिल्म लगी थी। बड़े-बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक ने फिल्म देखी। फिल्म से निकलते-निकलते नाना का एक डायलाग सबके मन में ऐसा बैठा कि कई दिनों तक उतरने का नाम नहीं लिया। फिर आया रिजल्ट का दौर। जैसा कि बनारस में होता है, रिजल्ट वाले दिन कोई रिश्तेदार, पटिदार या पड़ोसी बच्चों से पूछ ही लेता था कि रिजल्ट कैसा रहा। घर में कोई रिश्तेदार रिजल्ट पूछने आ गया तो बच्चे सामने पड़ने के बजाय कहीं से चिल्लाकर भागते 'आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने'
'कंट्रोल उदय, कंट्रोल' ने सड़क का गुस्सा हंसी में बदला
लहरतारा निवासी जीतू कक्कड़ के पास नाना से जुड़ी एक और याद है। वह ‘वेलकम’ देखकर लौट रहे थे। रास्ते में उनकी गाड़ी दूसरी गाड़ी से टकरा गई। दोनों तरफ से बात बढ़ने ही वाली थी कि संयोग से सामने से गुजर रहा एक व्यक्ति भी उसी फिल्म को देखकर लौट रहा था। उसने नाना के अंदाज में कह दिया 'कंट्रोल उदय, कंट्रोल' और पूरा माहौल बदल गया।
पूर्वांचल में कैमरा चला तो नाना ने यहां के लोगों को भी अपनी कहानी का हिस्सा बनाया
साल 2000 में फिल्म आंच की शूटिंग के लिए नाना पाटेकर वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र के छितौनी गांव पहुंचे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात गांव के संतोष मूरत सिंह से हुई। नाना को संतोष का साथ भाया तो शूटिंग खत्म होने के बाद वह उन्हें अपने साथ मुंबई ले गए। संतोष ने वहां 12 साल तक नाना के घर खाना बनाने का काम किया, और उन्हें साग से लेकर बनारसी बाटी तक का स्वाद चखाया।
आगे चलकर संतोष की अपनी जिंदगी की कहानी ही ऐसी हो गई, जिसे सुनकर किसी फिल्म की याद आती है। गांव लौटे तो सरकारी कागजों में उन्हें मृत बताया जा चुका था। इसके बाद उन्होंने खुद को जिंदा साबित करने की लंबी लड़ाई लड़ी। नाना से उनकी वह मुलाकात इसलिए भी याद रह गई कि शूटिंग के कुछ दिनों का साथ आगे चलकर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया।
सालों बाद फिर काशी लौटे, अस्सी से शुरू हुई 'जर्नी'
नवंबर 2023 में नाना पाटेकर एक बार फिर काशी पहुंचे। इस बार अनिल शर्मा की फिल्म जर्नी की शूटिंग के लिए। अस्सी घाट से शूटिंग शुरू हुई। डमरू और मंजीरे की धुन के बीच घाट पर फिल्म के दृश्य कैमरे में उतारे गए। इसके बाद काशी के दूसरे घाटों और शहर के अलग-अलग हिस्सों में भी शूटिंग हुई।
इस दौरान नाना ने कहा था कि वह करीब 35 साल बाद बनारस आए हैं और इस शहर को फिर से देखने के लिए उत्साहित हैं। काशी की गलियों और घाटों के बीच उनका पुराना रिश्ता जैसे एक बार फिर कैमरे के सामने आ गया। जर्नी बाद में वनवास नाम से रिलीज हुई।
