शिक्षा का अर्थ बेहतर नागरिक बनाना होता है। ऐसे में शिक्षा को रोजगार से जोड़ना उचित नहीं हैं। रोजगार एक पहलू हो सकता है, लेकिन शिक्षा का मूल उद्देश्य नहीं। खास तौर पर बुनियादी शिक्षा। बुनियादी शिक्षा वह 'बीज' है, जिससे समाज का निर्माण होता है। ऐसे में बुनियादी शिक्षा जमीन से जुड़ी होनी चाहिए ताकि बच्चों में सभ्यता, संस्कृति, राष्ट्र प्रेम, नागरिक सुरक्षा की भावना विकसित हो सके। शिक्षा के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हमें कॉमन सिलेबस बनाने की जरूरत है, ताकि एक ऐसा नागरिक तैयार किया जा सके जो अपनी संस्कृति, भाषा, समाज, परिवार, राष्ट्र के प्रति की भावना से ओतप्रोत हो।

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माय सिटी माय प्राइड के तहत शनिवार को नदेसर स्थित 'दैनिक जागरण ' के कार्यालय में शिक्षा पर आयोजित राउंड टेबल कांफ्रेंस का यह निष्कर्ष रहा। शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं से लेकर विभिन्न मुद्दों पर विशेषज्ञों ने बेबाक टिप्पणी की। विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान में हम शिक्षा के उद्देश्य से भटक गए हैं। तकनीकी और अंग्रेजी माध्यम का भूत अभिभावकों से लेकर नीति निर्धारणकर्ता पर सवार है।

यहीं कारण है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था त्रिशंकु बन कर रह गई है। बच्चा न तो अंग्रेजी और न हिंदी का एक पैरा शुद्ध लिख पा रहा है। बच्चों के स्थान पर अभिभावक होम वर्क कर रहे हैं। समय के साथ सिलेबस अपडेट करना बेहद जरूरी है। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए तकनीकी और अंग्रेजी भी जरूरी है, लेकिन एक सीमा तक।

 

इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी ही मातृभाषा भूल जाएं। अंग्रेजी एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए। वहीं तकनीकी का प्रयोग भी एक सीमा तक हो। रही बात रोजगार की तो माध्यमिक स्तर के बाद रोजगार परक पाठ्यक्रम संचालित किए जाएं। ताकि बच्चों को रोजगार मुहैया कराई जा सके। उच्च शिक्षा गुणवत्ता परक शोध पर आधारित होना चाहिए। ताकि इसका फायदा देश और समाज को मिल सके।

विशेषज्ञः किसने क्या कहा-

वर्तमान में गुरु-शिष्य की परंपरा खत्म हो गई है। शिक्षक नौकरी कर रहा है, न कि गुरु की भूमिका में अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है। यही कारण है कि शिक्षा में गिरावट आ रही है। उच्च शिक्षा का अस्तित्व भी खतरे में है। तमाम ऐसे शिक्षक आ रहे हैं, जिन्हें सिर्फ अपनी नौकरी की चिंता है। शिक्षक चरित्र का प्रतिबिंब भी है। ऐसे लोगों की कमी होती जा रही है, जिन्हें बच्चा आदर्श मानकर कुछ सीख सके। उच्च शिक्षा में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति हो, इसके लिए ओपन साक्षात्कार और वीडियोग्राफी होनी चाहिए। साथ ही इसको सार्वजनिक भी होना चाहिए। ताकि योग्य और अनुभवी शिक्षकों की नियुक्ति हो सके।
- प्रो. टीएन सिंह, कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ

प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक में बदलाव की जरूरत है। अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति हर हाल में बंद हो। शिक्षा में सबसे उच्च मानक शोध है, जब इसकी भी गुणवत्ता में गिरावट आएगी तो समाज को बहुत नुकसान होगा। आज इंग्लिश मीडियम की होड़ में बच्चों में अधकचरा ज्ञान भरा जा रहा है। सरकारी और प्राइवेट स्कूल के बीच में पिस रहे बच्चे न तो अपनी मातृभाषा हिंदी को अच्छी तरह समझ पा रहे हैं और न ही अंग्रेजी को। अच्छे शिक्षक आए इसके लिए सरकार, सोसाइटी और खुद अपने स्तर से सुधार करना होगा। कुलपति की नियुक्ति से पहले उनकी प्रापर्टी घोषित होनी चाहिए और कार्यकाल समाप्त होने के बाद इसका मूल्यांकन भी होना चाहिए। ताकि उच्च शिक्षा का भी स्तर सही रह पाए। इसके लिए सोसाइटी स्तर पर क्रांतिकारी पहल करने की जरूरत है। शिक्षा राष्ट्र एवं समाज के के लिए होनी चाहिए।
- प्रो. चंद्रकला पाडिया, पूर्व कुलपति, बीकानेर विश्वविद्यालय, राजस्थान

नई पीढ़ी के आने वाले अध्यापक तकनीक के भी जानकार हैं। साथ ही उच्च क्वालिफिकेशन भी रखते हैं। इसके कारण उनके मन में कहीं न कहीं भटकाव दिखाई देता है। ध्यान केंद्रित न होने के कारण वह बच्चों पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। इसके लिए काउंसिलिंग भी कराई गई थी। उसमें यह मामला उभर कर सामने आया। ऐसे शिक्षकों को प्रेरित किया जा रहा है। ताकि अध्ययन-अध्यापन पूरे मन से कर सके। माध्यमिक विद्यालयों की स्थिति बदली है। संसाधन बढ़े हैं, शिक्षकों की नियुक्तियां की जा रही है। ऐसे में संसाधन का अभाव नहीं रह गया है।
- अजय कुमार द्विवेदी, संयुक्त शिक्षा निदेशक

परिषदीय विद्यालयों में योग्य शिक्षकों की कमी नहीं है। निजी विद्यालयों की तुलना में सरकारी विद्यालयों में अच्छे शिक्षक हैं। फिर भी गुणवत्ता में कुछ खामियां हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। ज्यादातर सरकारी विद्यालयों में ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं, जिनकी प्राथमिकता पहले पेट भरना होता है। दूसरा प्रमुख कारण सरकारी विद्यालय मार्केटिंग और पैकेजिंग नहीं कर पा रहे हैं, जबकि निजी विद्यालय सिर्फ मार्केटिंग और पैकेजिंग पर ही चल रहे हैं। हालत यह है कि निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को इतना होम वर्क दे दिया जाता है कि उनके अभिभावक उसे पूरा करते हैं।
- उमेश कुमार शुक्ला, एडी, बेसिक

प्राचीन काल में गुरु-शिष्य की परंपरा रही है। समय के साथ यह परंपरा खत्म हो रही है। अब शिक्षा अर्थ परक हो गई है। शिक्षक भी व्यावसायिक होता जा रहा है। हायर क्वालिफिकेशन होने के बावजूद शिक्षक मन से नहीं जुड़ने के कारण पठन-पाठन पर कम ध्यान दे रहे हैं। शिक्षक को गुरु की भूमिका निभाना होगा। रही बात कॉमन सिलेबस की तो यूपी बोर्ड में कक्षा नौ से 12 तक एनसीईआरटी की किताबें वर्तमान सत्र से लागू की जा चुकी हैं।
- डॉ. विजय प्रकाश सिंह, डीआइओएस

पहले की तुलना में पढ़ाई का स्तर गिरा है। पहले का सिलेबस काफी प्रभावी था। बच्चों पर बोझ भी कम पड़ता था। अब बच्चों पर बोझ बढ़ रहा है। यह उचित नहीं है। आरटीई के तहत अब बच्चों को डांटना-फटकारना भी बंद कर दिया गया है। यही नहीं कक्षा आठ तक के बच्चों को हम फेल नहीं कर सकते। यह तमाम कारण है, जिसके चलते शिक्षा का स्तर गिरा है।
- सोमारू प्रधान, मंडलीय मनोवैज्ञानिक

जनपद में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च स्तर के शिक्षण संस्थानों की कमी नहीं है। बावजूद गुणवत्ता परक शिक्षा की बात की जाए तो जनपद के कुछ ही विद्यालय इस श्रेणी में आते हैं। इस पर हमें गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
- डॉ. अरुण श्रीवास्तव, लेक्चरर, सीटीई

शिक्षा में तकनीकी है, लेकिन जमीनी स्तर की भी शिक्षा जरूरी है। हमें जड़ और मिट्टी की शिक्षा को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है। माध्यमिक में नकल रोकने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगी। शिक्षा व पुस्तकों को जीवन से जोड़ने की जरूरत है। शिक्षा के क्षेत्र में सिलेबस को ठीक करना होगा। टेक्नोलॉजी को साधन बनाए बिना साध्य नहीं मिलेगा।
- प्रो. कल्पलता पांडेय, काशी विद्यापीठ

शिक्षा के द्वारा ही सब संभव है। इसलिए जरूरी है कि प्राथमिक स्तर पर तानाबाना मजबूत हो। अनुशासन ही देश को महान बनाता है, इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक और छात्र दोनों को अनुशासित रहना जरूरी है। शिक्षक को चाहिए कि समय-समय पर छात्रों के घर जाकर उसकी प्रणाली को देखते रहें। शिक्षा और संस्कार को बेहतर बनाने के लिए कोटेशन पर भी ध्यान देना होगा। साथ ही सरकार को चाहिए कि शिक्षकों का सिर्फ अध्यापन के लिए उपयोग करें। अन्य कार्यों में उपयोग करने पर गुणवत्ता में अंतर आएगा।
- प्रो. प्रेमशंकर राम सोनकर, शिक्षा संकाय, बीएचयू

जब तक शिक्षा की नीति ब्यूरोक्रेट के हाथ में रहेगी तब तक शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ नहीं होगी। अध्यापक सीधे बच्चों से जुड़ा रहता है। उसे पठन-पाठन की समस्याओं का पूरा ज्ञान होता है। ऐसे में शिक्षा नीति बनाते समय अध्यापकों को भी जोड़ना होगा।
- प्रो. पीएन सिंह, विभागाध्यक्ष, शिक्षा शास्त्र विभाग, संपूर्णानंद संस्कृत विवि

अफसोस की बात यह है कि वर्तमान में अध्यापक सिर्फ नौकरी करने आ रहा है। उसे अध्ययन अध्यापन से कोई खास लगाव नहीं है। अध्यापकों को यह सोच बदलनी होगी। वहीं नियमों में आए दिन हो रहे बदलाव के कारण विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है। उच्च शिक्षा में शिक्षकों के 50 फीसद तक पद रिक्त चल रहे हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है।
- प्रो. शंभू उपाध्याय, मनोविज्ञान विभाग, विद्यापीठ

प्राथमिक स्तर के सरकारी स्कूलों से अभिभावकों का मोह भंग हो चुका है। अपनी क्षमता के अनुसार अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला पब्लिक स्कूलों में करा रहा है। ऐसे में परिषदीय विद्यालयों में सुधार की जरूरत है। ताकि अभिभावकों में फिर से विश्वास बन सके। हालांकि उच्च शिक्षा के संस्थानों में अभिभावकों का विश्वास अभी बना हुआ है।
- प्रो. बंशीधर पांडेय, काशी विद्यापीठ

प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर मनमाने तरीके से अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल रहे हैं, जहां नैतिक शिक्षा पर बल कम दिया जा रहा है। यही कारण है कि हमारी शिक्षक संस्थाएं डिग्रियां बांट रही हैं। गुणवत्ता दिनो-दिन गिर रही है। इसे रोकने के लिए नैतिक शिक्षा बेहद जरूरी है।
- डॉ. राम सुधार सिंह, शिक्षाविद्

हम लोग शिकायती हो गए हैं। हमें अपने स्तर पर सुधार करने की जरूरत है। बुनियादी शिक्षा फसल का वह बीज है, जिसके माध्यम से हम राष्ट्र का निर्माण करते हैं। ऐसे में सबसे पहले हमें कॉमन सिलेबस बनाना होगा। राज्य स्तर और वैश्विक अथवा केंद्र स्तर पर। ताकि हमारे बच्चे विश्व फलक पर अपनी पहचान बनाने में सफल हो। साथ ही श्रेष्ठ नागरिक होने का भी परिचय दे सके।
- डॉ. अनूप मिश्र, एसोसिएट प्रोफेसर, डीएवी पीजी कॉलेज

हम शिक्षक से पहले मनुष्य भी हैं। मनुष्य होने के नाते हमारी आवश्यकताएं और समस्याएं भी होती है। ऐसे में सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इन सारी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के स्तर को बहुत बेहतर बनाने के लिए कड़ाई से कानून बनाएं। स्कूल अच्छा या बुरा नहीं होता, परिजनों को जागरूक होकर समय के साथ शिक्षा में भागीदारी निभानी होगी। मोरल एजुकेशन को भी प्राइमरी स्तर पर पूरी ईमानदारी से लागू करना होगा।
- डॉ. प्रतिमा गौड़, महिला महाविद्यालय, बीएचयू

शिक्षा की बेहतरी में हम सभी की भागीदारी बराबर की होनी चाहिए। सिर्फ सरकार के भरोसे रहने से काम नहीं चलेगा। सरकार अपने स्तर पर हमें मूलभूत ढांचा और अन्य व्यवस्थाएं मुहैया करा रही है, लेकिन इसका शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए सदुपयोग खुद के विवेक ओर इच्छा पर निर्भर है। हमारे स्केल में 1800 बच्चों में मात्र आठ शौचालय था और अब इसकी संख्या 26 कर दी गई है। इन सुविधाओं को मुहैया कराने से सरकार ने नहीं रोका है। हां, कोई जरूरी है नहीं है कि सीबीएसई, आईसीएसई बोर्ड ही अच्छा होता है। यूपी बोर्ड के स्कूल भी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों को बेहतर बनाते हैं योग्य शिक्षक और परिजन। आठवीं क्लास से ही करियर काउंसिलिंग जरूरी है। प्राइमरी स्तर से ही बच्चों को अनुशासन और स्वच्छता सिखाना जरूरी है।
- मनोज कुमार शाह, सचिव/ प्रबंधक, गोपीराधा बालिका इंटर कालेज

शिक्षा मनुष्य का निर्माण करती है। शिक्षकों में विल पावर विकसित करने की जरूरत है। शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए समाज के साथ ही परिवार को भी बेहतर होना पड़ेगा। हर मुद्दे पर मंथन करने की जरूरत है।
- डॉ. सरिता तिवारी, प्राचार्य, सीटीई

हम अपने बच्चों को इंजीनियर, डॉक्टर बनाना चाहते हैं। इसके चक्कर में अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ बच्चों पर बढ़ाते जा रहे हैं। बच्चों का बालपन खोता जा रहा है। इसपर ध्यान देने की जरूरत है।
- परमानंद सिंह, लेक्चरर, डायट

शिक्षा एवं शिक्षक की गुणवत्ता को सुधारने के लिए जरूरत है, शोध की गुणवत्ता का सुधारा जाए। कारण कि उच्च शिक्षा में पहुंचकर रिसर्च की गुणवत्ता में गिरावट आती जा रही है। शोध की अवधि कम की जाए और सभी सेमिनार को ऑनलाइन करने की जरूरत है। इससे उच्च शिक्षा में काफी सुधार होगा।
- डॉ. दिव्या श्रीवास्तव, आर्य महिला पीजी कॉलेज

प्राथमिक शिक्षा को आकर्षित करने की जरूरत है। सिर्फ मिड डे मील से हम बच्चों को आकर्षित नहीं कर पाएंगे। शिक्षा के क्षेत्र में मिलनी वाली मुफ्त की सारी चीजें बंद होनी चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के सारे कंटेंट मिट्टी से जुड़े होने चाहिए। शिक्षा प्रणाली में बहुत ज्यादा बदलाव की जरूरत है।
- प्रतिभा सिंह, समाजसेवी

शिक्षा समाज को जोड़ने का काम करती है। ऐसे में बुनियादी शिक्षा राष्ट्र निर्माण पर आधारित होनी चाहिए, जिसमें नैतिक, सामाजिक मूल्यों के साथ ही राष्ट्र प्रेम का भी समावेश किया जाना चाहिए। साथ ही हर बच्चों को एक समान शिक्षा मिल सके इस पर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।
- डॉ. आशीष

 

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By Nandlal Sharma