वाराणसी, जागरण संवाददाता। पूरे कोरोना काल में जहां दुनिया की पूरी अर्थव्यवस्था ठप सी हो गई थी, वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चरखा घर-घर वस्तुओं का उत्पादन करता रहा। इसे और सशक्त करने के उद्देश्य से जिले के सेवापुरी आदर्श ब्लाक में ग्रामोद्योग विकास योजना के तहत महिलाओं व युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इनके उत्पादों से बीते सालों में चीन व वियतनाम से आयात में हुई कमी को भरा जाएगा। खासकर इसमें अगरबत्ती उत्पाद शामिल है।

दरअसल, नीति आयोग, राज्य सरकार व खादी ग्रामोद्याेग ने सेवापुरी को आदर्श ब्लाक घोषित किया है। इसके तहत अधिकतम उत्पादन को प्राप्त करने के तर्ज पर काम किया जा रहा है। कटाई-बुनाई से जुड़े कामों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में खादी व ग्रामोद्योग आयोग 330 युवा कुम्हारों 250 महिलाओं को प्रशिक्षण देने जा रहा है। कुम्हारों को सजावट सामग्री बनाने में महारत हासिल कराया जाएगा। इससे वे इलेक्ट्रिक चाक पर भी सुनहरे वस्तुओं को बना सकेंगे। और महिलाएं अगरबत्ती बनाएंगी। इसके लिए विभाग कच्चा सामान उपलब्ध कराएगा। कुम्हारों को 27 जुलाई से 20-20 के एक-एक बैच को प्रशिक्षण दिया जाएगा।

चीन-वियतनाम को किया पीछे

आयोग के निदेशक डीएस भाटी ने बताया कि बीते दो सालों में चीन व वियतनाम की स्थितियां बदली हैं। वहां से सामान का आयात अब घटा है। ऐसे में बढ़ी मांग की पूर्ति के लिए यहां की उत्पादित अगरबत्ती की आपूर्ति की जा रही है। बाजार की समस्या नहीं है। यही कारण है कि महिलाएं हर रोज 250 रुपये आय कर रही हैं। देश भर में 7500 खादी भवन हैं। इससे भी उत्पादित सामानों की आपूर्ति में भरपूर मदद मिलती है।

हैंडलूम और पावरलूम को पहचानने की तरकीब : बुनकर जुनैद ने हैंडलूम और पावरलूम में अंतर पहचानने की तरकीबें भी सुझाई। कहा कि हैंडलूम पर तैयार साड़ी को ऊजाले में लाकर देखा जाता है तो उसकी बुनाई एकसमान नहीं दिखेगी, इसी से उसका लुक बेहद खास और आंखों को सुखद अहसास कराता है। जबकि पावरलूम की साड़ियों की बुनाई एक समान दिखेगी, जिससे उनमें कोई विशिष्टता नहीं झलकती है। यह ठीक उसी प्रकार से है जैसे मशीन के बजाय हाथ से बनी रोटी ज्यादा स्वादिष्ट महसूस होती है।

 

Edited By: Saurabh Chakravarty