काशी विद्वत परिषद ने लंदन में रखी मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि भारत लाने की मांग उठाई
काशी विद्वत परिषद ने लंदन में रखी मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि को भारत लाने की मांग की है। इसका उद्देश्य ...और पढ़ें

काशी विद्वत परिषद की मांग: लंदन से भारत लाई जाए मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि।
HighLights
लंदन से मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि लाने की मांग।
वर्तमान मनुस्मृति से मिलान कर भ्रम दूर करना उद्देश्य।
परिषद का लक्ष्य मूल पाठ का निरीक्षण, बदलाव नहीं।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी विद्वत परिषद ने लंदन में रखी मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि भारत लाने की मांग उठाई है। परिषद के महामंत्री राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि मूल पांडुलिपि भारत आने के बाद उसका वर्तमान में प्रचलित मनुस्मृति से मिलान किया जाएगा। इसके बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा। इस विषय पर परिषद संतों के साथ चर्चा कर रही है कि पांडुलिपि को भारत कैसे लाया जाए।
द्विवेदी ने कहा कि परिषद ने कुछ दिन पहले इस विषय पर चर्चा की थी। विलियम जॉन्स द्वारा संपादित मनुस्मृति और 1700 ईस्वी से पहले की मूल पांडुलिपि के बीच अंतर की जांच जरूरी है। विलियम जॉन्स ने अपने लेखन में उल्लेख किया है कि कई ग्रंथों और पुस्तकों को ब्रिटेन के पुस्तकालयों में भेजा गया था। ऐसे में परिषद का आग्रह है कि यदि मनुस्मृति की मूल पांडुलिपि लंदन या किसी अन्य विदेशी पुस्तकालय में उपलब्ध है, तो उसे भारत लाया जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि परिषद का उद्देश्य मनुस्मृति का खंडन करना या उसमें बदलाव करना नहीं है। कुछ लोग इस विषय को लेकर भ्रम फैला रहे हैं। परिषद केवल मूल पांडुलिपि का निरीक्षण और वर्तमान ग्रंथ से उसका मिलान करना चाहती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कौन-से विषय मूल पाठ में हैं और कौन-से बाद में जुड़े हैं।
द्विवेदी ने कहा कि मनुस्मृति के छठे अध्याय में धृति, क्षमा, शौच, इंद्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध जैसे गुणों को महामानव के लक्षण बताया गया है। ये ऐसे गुण हैं, जिन्हें हर समाज और हर व्यक्ति अपने जीवन में अपनाना चाहता है।
उन्होंने कहा कि मनुस्मृति में महिलाओं और समाज से जुड़े कुछ विषयों को भी पूर्वापर संदर्भ में समझने की जरूरत है। किसी भी ग्रंथ के अध्ययन में उसके पहले और बाद के प्रसंगों को ध्यान में रखना जरूरी है। परिषद का मानना है कि भगवान मनु ने मानव कल्याण के लिए विभिन्न विषयों का उल्लेख किया है। इसलिए मूल पांडुलिपि का अध्ययन और संतों, विद्वानों के साथ विचार-विमर्श के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा।
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