वाराणसी [अखिलेश मिश्र]। 'समय नहीं ठहरता, लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो जेहन में पूरे जीवन बनी रहती हैं। उनकी जब भी याद आती है तो कुछ कर गुजरने का जज्बा उफान मारने लगता है। ऐसा ही होता है आपातकाल के दौर को याद करने पर।' यह कहना है उन दिनों सेंट्रल हिंदू स्कूल में संचालित बीएचयू के इवनिंग कालेज के बीए प्रथम वर्ष के छात्र रहे कुंवर सुरेश सिंह का। डॉ. राममनोहर लोहिया को आदर्श मान राजनीति का ककहरा सीखते सुरेश सिंह का दायरा भी बढ़ने लगा था। देश में आपातकाल घोषित हुआ तो सत्ता विरोधी जंग में वह भी उतर पड़े थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी के खिलाफ हमउम्र युवाओं के साथ बड़े-बुजुगरें को भी लामबंद करने की मुहिम में जुट गए। भूमिगत रहना भी चुनौतीपूर्ण था।

एक दिन वाराणसी में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कर्मचारी सोमनाथ त्रिपाठी के आवास पर युवा एकत्र होकर आदोलन की रणनीति बना रहे थे। इसकी भनक प्रशासन को लगी और पुलिस ने छापा मारा। अन्य लोगों के साथ कुंवर सुरेश भी भागे और एक दीवार की आड़ में छुप गए, लेकिन पड़ोस के मकान के बरामदे से यह सब देख रहे एक व्यक्ति ने पुलिस को इशारा कर दिया। फिर क्या था कुंवर सुरेश को गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल भेज दिया। महीने भर बाद उन्हें रिहा तो किया गया, लेकिन अधिक दिन वह बाहर नहीं रह सके और पुलिस ने फिर गिरफ्तार कर लिया। उन्हें कुल तीन बार जेल जाना पड़ा। उस दौर की चर्चा करने पर कुंवर सुरेश की आखों में चमक बढ़ जाती है और 67 की उम्र में भी भुजाएं फड़कने लगती हैं। कुंवर सुरेश सिंह बताते हैं कि जेल में जो वरिष्ठ साथी थे वे छोटों की हमेशा फिक्र करते रहते थे।

और गिड़गिड़ाने लगे डिप्टी जेलर : दशाश्वमेध निवासी अशोक पांडेय उन दिनों उनके दोस्त हुआ करते थे। कुंवर बताते हैं कि रात में हमलोग गलियों व घाटों पर सरकार विरोधी पोस्टर चिपकाते थे। जेल में अशोक पांडेय के लिए डिप्टी जेलर ने आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। आपातकाल के बाद एक दिन वही जेल अधिकारी गोदौलिया क्षेत्र में रिक्शे से जाते दिख गए तो हमलोगों ने घेर लिया। इससे घबराकर वह हाथ जोड़ गिड़गिड़ाने लगे।

लोकनायक से हुई मुलाकात : कुंवर सुरेश सिंह ने बताया कि आपातकाल में एक बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण अचानक वाराणसी आए। कैंट स्टेशन पर तमाम रोकटोक के बावजूद उनके स्वागत के लिए कुछ लोग पहुंच गए। खुफिया तंत्र को इसकी भनक लग चुकी थी। हमलोगों ने लोकनायक के समर्थन और सरकार के विरोध मे नारे लगाए, लेकिन प्रशासनिक अमला कुछ नहीं कर सका। लोकनायक उस रात राजघाट स्थित गाधी विद्या संस्थान में रुकने के बाद अगले दिन रवाना हो गए। उनके संग हम युवाओं की टीम भी पुलिस से बचने के लिए मुगलसराय तक गई। इस दौरान लोकनायक ने हम लोगों को पटना बुलाया और कहा, वहां एक पुस्तिका देंगे। जिसकी प्रतियां हमें छपवाकर हमें वितरित करनी थी। लोकनायक से पुस्तिका लेने के बाद उनके निर्देश पर हम लोग पटना जेल में शिवानंद तिवारी से मिले। यहा शिवानंद ने आदोलन के दौरान खर्च के लिए हम लोगों को दो हजार रुपये दिए।

एक रुपये की जगह मिलते दस-दस रुपये : वाराणसी लौटकर लोकनायक की पुस्तिका छपवाकर बांटने का भी काम शुरू हो गया। इस पुस्तिका का खर्च निकालने के लिए सहयोग राशि एक रुपये थी, लेकिन लोग दस-दस रुपये तक दे देते थे। हर कोई लोकनायक का संदेश पढ़ना चाहता था। पुस्तिका के अंत में लोकनायक ने लिखा-'इंदिरा जी आप रहें या न रहें, लेकिन यह देश रहेगा और आपने जो किया है उसका परिणाम भी राष्ट्र आपको देगा।'

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