मीरजापुर, जेएनएन। चुनार क्षेत्र के सीखड़ निवासी सीएएफ जवान संतोष यादव ने आखिरकार तीन दिन व तीन रातों का दुरूह सफर पूरा किया और अपनी मातृभूमि स्थित घर पहुंच गए। गांव पहुंचने से ठीक पहले गंगा नदी पार कर जब वे घर आए तो परिवार में पिता जयप्रकाश, चाचा ओमप्रकाश सहित गांव वाले उनका बेसब्री से इंतजार करते मिले। एक तरफ मां को खोने का गम, दूसरी तरफ क्रियाकर्म में शामिल होने की संतुष्टि भरे भाव संतोष के चेहरे पर दिखे लेकिन कहीं से भी ऐसा नहीं लगा कि वे 1500 किमी का झंझावतों भरा सफर पूरा करके आए हैं।

सीखड़ के मूल निवासी व छत्तीसगढ़ में सीएएफ में तैनात संतोष यादव के तीन दिन व तीन रात के सफर में मित्रों ने पूरा साथ दिया। बीजापुर के धनौरा स्थित 15वीं बटालियन से उसके सहकर्मी मित्र ने बाइक से बीजापुर छोड़ा। बीजापुर से जगदलपुर 160 किमी की यात्रा उन्होंने धान के ट्रक से पूरी की। वहां से कोंडागांव भी ट्रक से पहुंचे। नाके पर तैनात एक पूर्व सहकर्मी ने उसे पहचाना व दवा की गाड़ी से आगे के लिए रवाना किया। रायपुर में संतोष ने अपने दोस्त श्रीनाथ से बात की। आरपीएफ में तैनात दोस्त ने बिलासपुर ट्रेन से भेजने की व्यवस्था की। साथ ही जवान को वर्दी पहनने की सलाह दी। बिलासपुर में ही रेलवे बाबू पद पर तैनात जिले के ही विकास ने मदद की व मालगाड़ी से शहडोल तक पहुंचवाया। शहडोल में तैनात लोको पायलट सीखड़ ब्लाक के ही श्रवण सिंह की मदद से वे रात नौ बजे कटनी पहुंचे। पूरी रात और दिन इंतजार के बाद अगले दिन कटनी से मालगाड़ी से साढ़े तीन बजे सतना पहुंचे। सतना से दोस्त प्रशांत ने मदद की और मालगाड़ी से ही वे शंकरगढ़ पहुंचे। स्टेशन मास्टर की मदद से रात डेढ़ बजे एक इंजन पर सवार होकर वे छिवकी स्टेशन पहुंचे। छिवकी के उप स्टेशन अधीक्षक दिवाकर नारायण जवान की पीड़ा व संघर्षों से द्रवित हुए व उच्चाधिकारियों से बात की। साथ ही एक मालगाड़ी को रूकवाकर संतोष को एक अधिकार पत्र के साथ चुनार तक के लिए विदा किया। शुक्रवार की सुबह छह बजे चुनार उतरने के बाद संतोष बाइक सवार की मदद से डगमगपुर आए। वहां से पैदल सिंधोरा घाट फिर गंगा नदी पार करके घर की दहलीज में दाखिल हुए। इस बीच परिजनों को संतोष की चिंता सताती रही।

यह है पूरा मामला

सीखड़ निवासी जयप्रकाश के बड़े बेटे संतोष छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल की 15वीं बटालियन में बीजापुर जिले के धनौर में तैनात हैं। बीते पांच अप्रैल को उनकी दृष्टिबाधित मांग राजेश्वरी का निधन हो गया। संतोष को सूचना मिली तो वे घर आने के लिए बेचैन हो गए। सात अप्रैल को वे छुट्टी लेकर घर के लिए निकल गए। मां की यादों को सहेजे नम आंखों से निकले जरुर लेकिन मुसीबतों का पहाड़ भरा रास्ता सामने था। ऐसे में दोस्तों ने खूब मदद की और जगह-जगह फोन से बात कर जवान को हौसला देते रहे। मां का दाह संस्कार तो पिता ने कर दिया था लेकिन क्रियाकर्म में शामिल होने की अभिलाषा लिए संतोष यह सफर पूरा किया।

 

Posted By: Saurabh Chakravarty

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