विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

काशी विश्वनाथ मंदिर में पत्थरों के क्षरण का पता लगाने आएगी IIT मद्रास की टीम, करेगी टेक्निकल टेस्टिंग

Published: Thu, 15 Oct 2026 06:30 AM (IST)

काशी विश्वनाथ मंदिर के प्राचीन पत्थरों के क्षरण का कारण जानने के लिए आईआईटी मद्रास की टीम 5 नवंबर को ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. आईआईटी मद्रास टीम 5 नवंबर को वाराणसी आएगी।

  2. मंदिर के पत्थरों के क्षरण का कारण पता लगाएगी।

  3. टूटे स्वर्ण शिखर की पुनर्स्थापना की योजना बनेगी।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के प्राचीन पत्थरों के क्षरण का कारण पता लगाने के लिए आइआइटी मद्रास की विशेषज्ञ टीम पांच नवंबर को वाराणसी आएगी। टीम आधुनिक उपकरणों की मदद से मंदिर के पत्थरों का तकनीकी परीक्षण करेगी। इसके आधार पर पत्थरों को सुरक्षित रखने और टूटे स्वर्ण मंडित शिखर को दोबारा स्थापित करने की योजना बनाई जाएगी।

अप्रैल में मंदिर के गर्भगृह के ऊपर वायव्य कोण पर स्थापित स्वर्ण मंडित शिखर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया था। प्रारंभिक तौर पर इसके पीछे बंदरों की उछल-कूद और पत्थरों के क्षरण की आशंका जताई गई थी। टूटे हिस्से को मंदिर के लाकर में सुरक्षित रखवा दिया गया। इसके बाद मंदिर प्रशासन ने पत्थरों के क्षरण को रोकने और प्राचीन संरचना के संरक्षण के लिए विशेषज्ञों से संपर्क किया।

आइआइटी मद्रास के स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग विभाग को दी जिम्मेदारी 

मंडलायुक्त एस राजलिंगम ने बताया कि मंदिर के प्राचीन पत्थरों पर सोने की परत चढ़ाई गई है। आशंका है कि समय बीतने और बारिश जैसे मौसमी प्रभावों के कारण पत्थरों का क्षरण हो रहा है। पहले बीएचयू आइआइटी से तकनीकी जांच के लिए संपर्क किया गया, लेकिन स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकलने पर आइआइटी मद्रास के स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग विभाग को जिम्मेदारी दी गई।

आइआइटी मद्रास की टीम 27 और 28 मई को भी मंदिर आई थी। उस दौरान प्राथमिक परीक्षण के बाद पत्थरों का विस्तृत तकनीकी विश्लेषण कराने का सुझाव दिया गया था। इसके लिए तीन सितंबर को संस्थान को 18 लाख रुपये का भुगतान किया गया।

यह भी पढ़ें- फांसी की सजा के बाद कैदी नंबर 395 और 396 बने साहिल-मुस्कान, जेल पहुंचते ही बिलख पड़े दोनों गुनहगार

अब पांच नवंबर को डा.अरुण मेनन के नेतृत्व में टीम परीक्षण करेगी। इसकी रिपोर्ट के आधार पर शिखर की पुनर्स्थापना और पत्थरों के क्षरण को रोकने के उपाय तय होंगे। मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सत्यम मिश्र ने बताया कि वर्ष 2017 में आइआइटी रुड़की की टीम ने भी पत्थरों का सर्वे किया था। करीब नौ साल बाद संरचना की स्थिति में बदलाव को देखते हुए नए सिरे से जांच कराने का निर्णय लिया गया है।