यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 10, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
कूची कैनवास उकेर रहे वाराणसी के स्वातंत्र्य समर का इतिहास, संस्कृति संसद के क्रम में चित्रकला कार्यशाला शुरू
गंगा महासभा व दैनिक जागरण की ओर से आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद का श्रीगणेश तो 12 नवंबर को होगा ...और पढ़ें

जागरण संवाददाता, वाराणसी। गंगा महासभा व दैनिक जागरण की ओर से आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद का श्रीगणेश तो 12 नवंबर को होगा लेकिन इसके आधार स्तंभ के रूप में चित्रकला कार्यशाला बुधवार को शुरू हो गई। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के ललित कला विभाग में सिद्धहस्त कलाकारों ने कूची से कैनवास पर स्वातंत्र्य समर को उकेरा तो इसमें काशी के गौरवशाली रंग भरे। इन चित्रों को 12 से 14 नवंबर तक चलने वाली संस्कृति संसद के दौरान आयोजन स्थल रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सम्मेलन केंद्र की वीथिका में सजाया जाएगा। इसमें झांसी की रानी यानी काशी के घाटों पर पली बढ़ी मनु का शौर्य नजर आएगा तो बापू व महामना मदन मोहन मालवीय का देश के लिए समर्पण भी नजर आएगा।
इस दो दिवसीय कार्यशाला का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार व गंगा महासभा के राष्ट्रीय महासचिव जीतेन्द्रानंद सरस्वती ने दीप जलाकर शुभारंभ किया। कैनवास पर राष्ट्र-धर्म को समर्पित संदेश भी उकेरे। इस खास मौके पर इंद्रेश कुमार ने कहा कि पहले व अब के भारत के अंतर को समझने की जरूरत है। देश आजाद होने के बाद आजादी दिलाने वाले देशभक्त ही धीरे-धीरे डस्टबिन में डाल दिए गए। सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक, झांसी की रानी पाठ्यक्रमों से बाहर हो गए। अब स्वतंत्रता के 75 वर्ष में अमृत महोत्सव के माध्यम से देशभक्तों को यथोचित स्थान-सम्मान देने का काम चल रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना व नेहरू ने भारत को दो भागों में बांट दिया। अंग्रेजों के षडयंत्र के शिकार जिन्ना व पं. नेहरू ने भारत को कांग्रेस व लीग के रूप में विभाजित कर दिया। उस दौरान देश में 12 लाख लाशें गिरीं, दो हजार पूजा स्थल तोड़े गए। लाखों का धर्मांतरण हुआ। वहीं यह भी सच है कि आजादी की कीमत चुकाने वाले देशभक्तों को ही धीरे-धीरे भुला दिया गया। आज हम लोग ऐसे देशभक्तों को याद करने के लिए जुटे हुए हैं। पहले व अब के भारत में अंतर आप साफ दिखाई देता है। परिवर्तन के इन अहसासों को संस्कृति संसद में भी महसूस करेंगे। अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष में अमृत महोत्सव के तहत अखिल भारतीय संत समिति व श्रीकाशी विद्वत परिषद के मार्गदर्शन में गंगा सेवा समिति व दैनिक जागरण के संयुक्त तत्वावधान में रूद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सम्मेलन केंद्र में तीन दिवसीय संस्कृति संसद 12 नवंबर से शुरू होने जा रहा है। काशी विद्यापीठ में आयोजित कार्यशाला इसी की एक कड़ी है। इसमें काशी के युवा कलाकार स्वतंत्रता आंदोलन में काशी के योगदान पर चित्र बनाएंगे। समारोह में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय मंत्री अशोक तिवारी, आयोजन समिति के संयोजक गोविंद शर्मा, ललित कला विभाग के प्रभारी डा. सुनील विश्वकर्मा आदि थे।
ये कलाकार बनाएं इन महापुरुषों का चित्र
प्रो. सरोज रानी-झांसी की रानी, डा. सुनील कुमार कुशवाहा- मालवीय जी का बीएचयू में गांधी से विचार विमर्श करते हुुए, शालनी कश्यप-शिव प्रसाद गुप्त और काशी विद्यापीठ, डा. शशिकांत नाग-दुम दवा की गाथा-वारेन हिस्टिंग, राजकुमार- मुंशी प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित कथा, आकाश गुप्ता-डा. भगवान दास, निखिलेश प्रजापति-पं. कमलापति त्रिपाठी, आशीष राम-तुलसीदास व तुलसी घाट पर, संजय कुमार-एनी वेसेंट, केएम मेहरा-स्वामी विवेकानंद का काशी प्रेम, बलदाऊ वर्मा व आशा- कोकोरी घटना, आजाद कपूर-चंद्रशेखर आजाद, रजनीकांत त्रिपाठी-महात्मा गांधी, मुन्ना चौहान- गांधी जी और भारत माता मंदिर, पद्विनी मेहता-काशी घाट, डा. सुनील विश्वकर्मा-काशी का गुंडा तथा डा. शत्रुध्न प्रसाद- आजादी में काशी के योगदान पर चित्र बनाएंगे।
