वाराणसी, जेएनएन। मार्च माह में ही गंगा अपने घाटों से रुखसती की ओर हैं, घाटों पर पसरी गंदगी और उपेक्षा का नजारा मानमंदिर घाट पर अब आम है। अाने वाले माह में गर्मियां अपने चरम पर होंगी और गंगा का रुख मझधार की ओर होगा तो घाट के ठाठ भी गंगा से दूरी ही वजह से उदास नजर आएंगे।

वैसे मानमंदिर घाट पर राजस्थानी शैली में निर्मित अदाल्मेश्वर मंदिर, सोमेश्वर महादेव, रामेश्वर व स्थूलदन्त विनायक मंदिर में आस्थावानों का जमावड़ा रहता है। यहां पर राजस्थानी पर्यटकों के अलावा सर्वाधिक विदेशी पर्यटक भी घाट पर आते हैं और काशी के वैभव में राजस्थान की राजसी परंपरा को भी करीब से महसूसते हैं। काशी के प्रमुख चौरासी घाटों में अधिकतर वह घाट अधिक समृद्ध रहे हैं जिनको पूर्व में राजाओं ने निर्मित कराए हैं उनमें मानमंदिर घाट की विशेष पहचान रही है। माना जाता है कि सोलहवीं शताब्दी में आमेर के किले की ही भांति राजा मानसिंह ने यहां पक्का घाट और महल ही नहीं बल्कि मंदिरों का भी निर्माण कराया। आज भी राजस्थानी शैली से निर्मित यह स्थल काफी वैभवशाली है बस घाटों पर गंदगी का नजारा पर्यटकों को इन दिनों निराश कर रहा है। 

ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स प्रिंसेप ने भी इस प्रमुख घाट का उल्लेख अपने दस्तावेजों में किया है। मगर काशी के इतिहासकार पुराने प्रमाणों का हवाला देकर बताते हैं कि घाट पूर्व में शिव को समर्पित था और दस्तावेजों में इसे सोमेश्वर घाट माना जाता है। कालांतर में मानसिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया इसलिए घाट को उनका नाम मिला। वहीं नक्षत्र वेधशाला के लिए घाट की अलग ही पहचान है। महल को भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में ले लिया गया और उसे उन्नत भी किया गया है। मगर अब घाट पर पसरी गंदगी और गंगा के रुख से आने वाले देसी और विदेशी पर्यटक भी दुखी होकर लौट रहे हैं। घाट पर पसरी गंदगी के बीच लोगों का आना जाना भी इन दिनों कम ही है। 

 

Posted By: Abhishek Sharma

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