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वाराणसी में 'ग्रीन' के चक्कर में 'रेड' हुआ पटाखा बाजार, न रौनक, न दावों में कमी

By Prakash Pandey Edited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 04 Nov 2026 10:37 AM (IST)

वाराणसी में ग्रीन पटाखों के दावों और हकीकत में अंतर है। ये महंगे, कम उपलब्ध और अक्सर नकली होते हैं, ...और पढ़ें

वाराणसी में ग्रीन पटाखों का बाजार: महंगे, नकली और प्रदूषण का खतरा।

वाराणसी में ग्रीन पटाखों का बाजार: महंगे, नकली और प्रदूषण का खतरा।

HighLights

  1. ग्रीन पटाखे महंगे, कम उपलब्ध और अक्सर नकली मिल रहे हैं।

  2. सामान्य पटाखों को ग्रीन बताकर ग्राहकों को बेचा जा रहा है।

  3. ग्रीन पटाखे भी धुआं और प्रदूषण करते हैं।

जागरण, संवादददाता, वाराणसी। बाजार में ग्रीन पटाखे को लेकर बड़े- बड़े दावे किए जा रहे हैं। इसको लेकर ज्ञान गंगा भी खूब बह रही है लेकिन हकीकत कुछ अलग की कहानी सुना रही है। ग्रीन पटाखे के चक्कर में पटाखा पूरी तरह रेड बाजार में तब्दील है।ग्राहक की शिकायत है कि ग्रीन पटाखे महंगे दाम पर मिल रहे हैं लेकिन इसके ज्वलनशीलता व धुएं सामान्य पटाखों से ज्यादा तकलीफ दे रहा है। यही आलम पिछली बार भी रहा।

बाहर पटाखे जल रहे थे और घर के अंदर दमा से पीड़ितों की सांसें चढ़ रही थीं। त्योहार उनका भी था, खुशियां उनके घर भी आनी थी, बाहर उत्सव की रोशनी थी, मगर घर के भीतर सांस और सुकून बचाने की जद्दोजहद। दीपावली पर आतिशबाजी के इस असर को कम करने के लिए ग्रीन पटाखों का विकल्प सामने आया, लेकिन वाराणसी के बाजार में आज भी इसकी उपलब्धता और पहचान दोनों सवालों के घेरे में हैं।

ग्रीन पटाखों के नाम पर नकली पटाखों की है भरमार

अर्दली बाजार के पटाखा कारोबारी सौरभ गुप्ता ने बताया कि ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से डेढ़ से दो गुना तक महंगे हैं। स्थानीय स्तर पर इनका निर्माण नहीं होने और सीमित आपूर्ति के कारण बाजार में उपलब्धता भी कम है। हाड़ा सराय के तौफीक रजा वो बताते है कि कुछ दुकानदार सामान्य पटाखों को ग्रीन बताकर बेच रहे हैं। ऐसे में ग्राहकों के लिए असली और नकली की पहचान करना आसान नहीं है।

30 प्रतिशत तक कम उत्सर्जन, फिर भी धुआं

पर्यावरण वैज्ञानिक डा. कृपा राम ने बताया कि ग्रीन पटाखों की रासायनिक संरचना में बदलाव कर सूक्ष्म कणों और कुछ गैसों का उत्सर्जन घटाया जाता है। सीएसआइआर-नीरी के मानकों के अनुसार पारंपरिक पटाखों की तुलना में पीएम उत्सर्जन में कम से कम 30 प्रतिशत कमी का मानक है। स्वास, स्टार और सफल इसकी प्रमुख श्रेणियां हैं। हालांकि ग्रीन का अर्थ प्रदूषण मुक्त होना नहीं है। इनके जलने पर भी धुआं और आवाज निकलती है। पटाखों से पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कणों के साथ सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड और कार्बन मोनोआक्साइड जैसी गैसें भी निकल सकती हैं। इनकी मात्रा पटाखे के प्रकार और रासायनिक संरचना पर निर्भर करती है।

प्रदूषक हवा से कहां जाते हैं

पटाखों से निकली गैसें हमेशा हवा में नहीं रहतीं। सल्फर डाइआक्साइड और नाइट्रोजन आक्साइड रासायनिक प्रतिक्रियाओं से दूसरे कणों में बदल जाते हैं। कुछ कण बारिश और नमी के साथ जमीन व जलस्रोतों तक पहुंचते हैं। धातुओं के कण मिट्टी और पानी में जमा हो सकते हैं। पेड़ कुछ धूल और प्रदूषक कणों को पत्तियों पर रोकते हैं, लेकिन सभी जहरीली गैसों को सोखकर खत्म नहीं कर सकते।


कड़वा सच

  • ग्रीन पटाखे डेढ़ से दोगुने महंगे, बाजार में उपलब्धता कम
  • सामान्य पटाखों को भी ग्रीन बताकर बेचने की शिकायत
  • 30 प्रतिशत तक उत्सर्जन घटाने का मानक, फिर भी धुआं और शोर से पूरी तरह मुक्ति नहीं


ध्यान दें

  • ग्रीन पटाखे का क्यूआर कोड और प्रमाणन जांचें।
  • ग्रीन पटाखे भी धुआं और शोर पैदा करते हैं।
  • प्रदूषण घटाने का सबसे प्रभावी उपाय उसका उत्सर्जन कम करना है।

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