वाराणसी, जेएनएन। काशी के पास त्रैलोक्य से न्यारी होने का रुतबा ऐसे ही नहीं है। दुनिया की प्राचीन धर्म नगरी में देवालयों की कतार और गुरु की महिमा का विस्तार है। सप्तपुरी समाहित तो योग व तंत्र साधना की धुरी भी है यह नगरी। इसके लिए गंगा के घाट-गलियों में भटकने की जरूरत नहीं, इससे एकाकार रूप में शहर के दक्षिणी छोर पर गुरुधाम मंदिर में सहज ही साक्षात्कार हो जाएगा। धर्मानुरागी हों, जिज्ञासु या ज्ञान पिपासु, अष्टांग योग से जुड़े अष्टकोणीय मंदिर से सामना होते ही कबीरदास के दोहे कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढूंढ़ै वन माहि.. का भाव जरूर जग जाएगा।

दरअसल, इस पुरातात्विक-आध्यात्मिक स्थान के नाम से ही अब पहचान पा चुके मोहल्ले गुरुधाम में योग-तंत्र साधना से जुड़ा 205 साल पुराना भव्य मंदिर कुछ ऐसा ही अहसास कराता है। योग-तंत्र साधना से जुड़े मंदिर में आठ द्वार रहस्य और रोमांच जगाते हैं। इसमें एक गुरु को समर्पित तो अन्य सात, सप्तपुरियों यथा -अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काची, अवंतिका व पुरी के नाम आते हैं। तीन मंजिला भवन में भूतल पर गुरु वशिष्ठ- अरुंधती विराजमान तो दूसरे पर नटवर नागर श्रीकृष्ण राधा रानी के साथ विद्यमान थे। हालांकि अब उनकी प्रतिमा तो नहीं लेकिन आभास जरूर हो जाता है। तीसरा तल शून्य को समर्पित जो निरंकार का बोध कराता है। पश्चिमी द्वार से बाहर निकलते ही विशाल आंगन के दोनों किनारों पर सात -सात लघु देवालय चौदह भुवन की परिकल्पना को साकार करते हुए कदमों की बेड़ी बन जाते हैं।

हाल में संगमरमरी चौकी पर राधा-कृष्ण के पद चिह्न और गुरु की चरण पादुका तो अब दृश्य नहीं लेकिन उस स्थल पर नजर पड़ते ही सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं। दीवारों पर अंकित ध्यानाग्र चेहरे भव्यता में चार चांद लगाते हैं खास यह कि एरियल व्यू (आसमान से देखने पर) में यह मंदिर की छवि अष्टकोणीय रथ जैसी नजर आती है। योग व तंत्र साधना से जुड़े गुरु मंदिर का राजा जयनारायण घोषाल ने वर्ष 1814 में निर्माण कराया था। कहा जाता है इस तरह का दूसरा मंदिर हंतेश्वरी (पश्चिम बंगाल) व तीसरा भदलूर (दक्षिण भारत) में है। इस मंदिर में स्वामी विवेकानंद, माता आनंदमयी, पं. गोपीनाथ कविराज भी शीश नवा चुके हैं। छह साल में बदली तस्वीर समय की मार से बेजार पुरातात्विक महत्व के अनूठे मंदिर पर सरकार की नजर तीन दशक पहले गई।

पुरातात्विक-आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए शासन ने 1987 में इस मंदिर को संरक्षित घोषित किया। राज्य पुरातत्व विभाग की क्षेत्रीय इकाई ने 2007 में इसे कब्जे में लिया। इसके साथ ही अतिक्रमण के गाल में समा चुकी दरो -दीवार की साज संवार 2012-203 में शुरू की गई। इसके लिए शासन ने 13वें वित्त आयोग के तहत 1.38 करोड़ रुपये खर्च किए तो प्रसाद योजना के तहत 0.82 करोड़ रुपये से हरियाली और रोशनी से रंगत निखारी गई। वर्ष 2016 में इसकी साज सज्जा कर आम जनता के लिए खोल दिया गया। क्षेत्रीय पुरातत्व इकाइ के सद्प्रयास से वर्तमान में यह स्थान सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका है। पर्यटन के नक्शे पर आने के साथ देशी-विदेशी सैलानियों का आवागमन धीरे-धीरे शुरू हो चुका है।

पुरा विशेषज्ञों ने तकनीक से लौटाई पुरानी रंगत प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार में पुरा तकनीक अपनाई गई। भवन की दीवारों को खड़ा करने में लगे पदार्थो का प्रयोगशाला में बारीकी से परीक्षण कराया गया। तद्नुसार लखौरी ईट, सुर्खी, चूना, मोटा बालू, बरी, मोरंग से मरम्मत कराई गई। इसमें सीमेंट के बजाय गुड़, बेल के गूदे, उड़द व मेथी दाना को पानी में सड़ाकर घोल बनाया गया। कई धरन बदली गई तो दरवाजे-खिड़की भी पूर्व की तरह साखू के लगे। चमक खो चुके पत्थरों व दीवारों की केमिकल क्लीनिंग के साथ ही लेपन भी कराया गया। हालांकि अभी कुछ काम बचे भी हैं।

बोले अधिकारी : योग साधना की भावभूमि पर निर्मित यह अद्भुत मंदिर भारत की धार्मिक व राष्ट्रीय एकता के साथ ही ध्यान व भक्ति के माध्यम से अपनी अभीष्ट की प्राप्ति का प्रमुख प्रतीक है। उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं, उसकी प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्मारक है। - डा. सुभाषचंद्र यादव, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी

कैसे पहुंचें  : कैंट रेलवे स्टेशन से लंका रोड पर दुर्गाकुंड से पहले गुरुधाम चौराहा स्थित है। दाहिने हाथ मुड़ते ही कुछ ही दूरी पर मंदिर है।

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