विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

‘हनुमान अंश’ के निर्देशक बीएचयू में बोले - ‘नशे में डूबा युवा 10 हजार लोगों को लेकर देश की दिशा-दशा बदलने की बात करता है’

By Vns Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
Published: Sat, 10 Oct 2026 07:10 PM (IST)

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में 'हनुमान अंश' के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने युवाओं को नशे से दूर रहने और भारतीय ...और पढ़ें

'हनुमान अंश' के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने बीएचयू में युवाओं को दिया नशामुक्त भारत का संदेश।

'हनुमान अंश' के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने बीएचयू में युवाओं को दिया नशामुक्त भारत का संदेश।

HighLights

  1. डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने युवाओं को नशे से दूर रहने का संदेश दिया।

  2. भारतीय संस्कृति से जुड़ने और सपनों पर ध्यान केंद्रित करने को कहा।

  3. फिल्मों में नशे को आकर्षक दिखाने पर गंभीर सवाल उठाए।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित ‘यूथ फॉर विकसित भारत: माई भारत युवा सम्मेलन’ में फिल्म ‘हनुमान अंश’ के निर्देशक डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने युवाओं को नशे से दूर रहने और भारतीय संस्कृति से जुड़ने का संदेश दिया। केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन में देशभर से युवा शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान डॉ. चतुर्वेदी ने ‘हनुमान अंश’ का गीत गाया और युवाओं से हनुमान चालीसा का पाठ भी कराया।

डॉ. विशाल चतुर्वेदी ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नशामुक्त युवा और नशामुक्त भारत की बात करते हैं। युवा जब नशे की गिरफ्त में आ जाता है, तो उसकी ऊर्जा और क्षमताओं का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता। युवाओं को अपने सपनों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें पूरा करने तक किसी भी तरह के भटकाव से बचना चाहिए। नशा भी ऐसा ही एक बड़ा भटकाव है।

उन्होंने कहा कि सिगरेट पीना शुरुआत में भले ही कूल लगे, लेकिन इससे फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है। नशे की निर्भरता जीवन का कीमती समय भी बर्बाद करती है। युवाओं को समझना होगा कि उनकी असली ताकत उनकी ऊर्जा, सोच और कुछ कर गुजरने का जज्बा है। बताया क‍ि नशे में डूबा युवा 10 हजार लोगों को लेकर जंतर-मंतर पहुंचकर देश की दिशा-दशा बदलने की बात करता है’। 

फिल्मों में नशे को कूल दिखाने पर उठाए सवाल

फिल्म इंडस्ट्री में करीब 15 साल का अनुभव साझा करते हुए डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि फिल्मों और सोशल मीडिया के जरिए कई बार नशे को आकर्षक अंदाज में पेश किया जाता है। इससे युवाओं के बीच गलत संदेश जाता है। फिल्मों में नशे के महिमामंडन को चुनौती देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में सभी लोग नशा नहीं करते, लेकिन कुछ लोगों की जीवनशैली और पर्दे पर दिखाई जाने वाली छवि इसका प्रचार करती है।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे फिल्मों में दिखाई जाने वाली हर चीज को अपनी जिंदगी का आदर्श न बनाएं। पर्दे पर जो आकर्षक दिखता है, जरूरी नहीं कि वह वास्तविक जीवन में भी सही हो।

सनातन संस्कृति पर फिल्म बनाना आसान नहीं था

डॉ. चतुर्वेदी ने अपने फिल्मी सफर के बारे में बताया कि उन्होंने बीआरडी मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। कुछ समय तक अलग-अलग जगह नौकरी करने के बाद वह मुंबई पहुंचे और फिल्म इंडस्ट्री में काम शुरू किया। वहां उन्हें लगता था कि सनातन संस्कृति और भारतीय मूल्यों से जुड़ी कहानियों के लिए मुख्यधारा के सिनेमा में जगह बनाना आसान नहीं है।

उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें बताया जाता था कि फिल्मों में फूहड़ता, डांस नंबर, गाली-गलौज, धूम्रपान और शराब को आकर्षक अंदाज में दिखाए बिना दर्शकों के बीच पहचान बनाना मुश्किल है। बड़े स्टार, स्टूडियो या नामचीन निर्माता के बिना भी फिल्म को बड़े स्तर पर पहचान मिलना आसान नहीं माना जाता था। साधु-संतों और भारतीय संस्कृति पर आधारित फिल्म बनाने को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं जताई जाती थीं।

नीम करौली बाबा से प्रेरित है ‘हनुमान अंश’

डॉ. चतुर्वेदी ने बताया कि एक बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म ने उनसे ऐसी भारतीय कहानी सुनाने को कहा था, जिसका महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो। इसके बाद उन्होंने नीम करौली बाबा के जीवन और विचारों से प्रेरित कहानी प्रस्तुत की, जो आगे चलकर ‘हनुमान अंश’ के रूप में सामने आई।

उन्होंने कहा कि नीम करौली बाबा के विचारों और उनके प्रति दुनिया भर में लोगों की आस्था को देखते हुए उन्हें लगा कि यह कहानी भारत के साथ-साथ विदेशों के दर्शकों तक भी पहुंचनी चाहिए। उनका मानना है कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ी कहानियां भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकती हैं।

युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने की जरूरत

डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जब भी बदलाव की जरूरत महसूस हुई या युवाओं का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव कमजोर हुआ, तब उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास जरूरी रहे हैं। उनके अनुसार, ‘माई भारत’ जैसी पहल युवाओं को देश के विकास और सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने का माध्यम बन सकती है।

उन्होंने कहा कि युवा अपनी ऊर्जा को नशे और भटकाव में गंवाने के बजाय अपने लक्ष्य, देश के विकास और सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने में लगाएं। यही ऊर्जा विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।