चंपत राय ने युवाओं को गुमराह करने में विदेशी शक्तियों का हाथ बताया
काशी में संस्कृति संसद में चंपत राय ने कहा कि विदेशी ताकतें युवाओं को गुमराह कर रही हैं, जिससे देश ...और पढ़ें

चंपत राय का बड़ा बयान: विदेशी शक्तियां कर रहीं युवाओं को गुमराह, संस्कृति संसद में बोले।
HighLights
विदेशी शक्तियां युवाओं को गुमराह कर देश को कमजोर कर रही हैं।
संत समाज सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
भारत ने इतिहास में कई आर्थिक-राजनीतिक संकटों का सामना किया।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी में आयोजित संस्कृति संसद में बुधवार को दूसरे दिन चंपत राय ने कहा कि विदेशी शक्तियां युवाओं को गुमराह कर सड़क पर विरोध प्रदर्शन करा रही हैं। देश को ऐसी ताकतों से बचाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि त्योहारों में आई कमी को दूर करने और समाज में सांस्कृतिक चेतना जगाने में संत समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
चंपत राय ने कहा कि भारत ने इतिहास में अनेक आर्थिक और राजनीतिक संकटों का सामना किया, लेकिन अपनी मजबूती बनाए रखी। उन्होंने मौर्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 2000 वर्ष पहले भारत आर्थिक रूप से अत्यंत संपन्न था। जब दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक संकट आया, तब भारत अपने पैरों पर खड़ा रहा। आर्थिक अभाव से जूझ रहे बाहरी समूहों ने भारत पर आक्रमण किए और लूटपाट की।
उन्होंने कहा कि भारत ने हर आक्रमण के सामने हार नहीं मानी। आठवीं शताब्दी में सिंध पर हुए आक्रमण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आक्रमणकारियों को वापस लौटना पड़ा। बाद के दौर में महमूद गजनवी के आक्रमण हुए, जबकि 12वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के संघर्ष के बाद देश में पतन की प्रक्रिया तेज हुई। इसके बाद विभिन्न शासकों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए हिंसा और कत्लेआम किए।
चंपत राय ने पुर्तगालियों के शासनकाल में गोवा में हुए अत्याचारों का भी जिक्र किया। उन्होंने गोवा इनक्विजिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां स्थानीय लोगों पर गंभीर अत्याचार किए गए। उन्होंने कहा कि आज समाज में जागरूकता बढ़ने से महापुरुषों के प्रति अनादर फैलाने के प्रयास सफल नहीं हो सकते। शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे वीरों के प्रति समाज की श्रद्धा मजबूत हुई है।
उन्होंने कहा कि सरकार आर्थिक विकास और शिक्षा के प्रसार के लिए काम कर सकती है, लेकिन देश में वैचारिक, सांस्कृतिक एकता और सामाजिक चेतना का वातावरण बनाने में संत समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संत समाज कठिन परिस्थितियों में लोगों का मनोबल बनाए रखने और समाज को दिशा देने का काम कर सकता है।
चंपत राय ने तुलसीदास का उदाहरण देते हुए कहा कि जब दिल्ली की सत्ता को सर्वोच्च मानने का वातावरण था, तब तुलसीदास ने काशी से भगवान राम की महिमा का उद्घोष किया। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया, जिसमें मुगल शासक ने वृंदावन के एक संत की विद्वत्ता और आध्यात्मिक ज्ञान के बारे में सुनकर उनसे मिलने की इच्छा जताई थी।
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