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‘ब्राज़ील इन बनारस’ को देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में मिला स्टैंडिंग ओवेशन सम्‍मान

By Shrawan BhardwajEdited By: Abhishek sharma
Published: Sun, 04 Oct 2026 11:29 AM (IST)

निर्देशक हरीश शर्मा की डॉक्यूमेंट्री 'ब्राज़ील इन बनारस: ए भैरब दत्त स्टोरी' को 11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्टैंडिंग ...और पढ़ें

देहरादून फिल्म फेस्टिवल में 'ब्राज़ील इन बनारस' ने जीता दिल, भैरब दत्त की कहानी को सम्मान।

देहरादून फिल्म फेस्टिवल में 'ब्राज़ील इन बनारस' ने जीता दिल, भैरब दत्त की कहानी को सम्मान।

HighLights

  1. 'ब्राज़ील इन बनारस' को देहरादून फिल्म फेस्टिवल में स्टैंडिंग ओवेशन मिला।

  2. फुटबॉलर भैरब दत्त की प्रेरणादायक कहानी, वाराणसी में फुटबॉल नर्सरी।

  3. युवा खिलाड़ियों को तैयार करने के उनके समर्पण को दर्शकों ने सराहा।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। कभी-कभी खेल की सबसे बड़ी जीत किसी ट्रॉफी या मेडल में नहीं, बल्कि उन जिंदगियों में दिखाई देती है जिन्हें एक खिलाड़ी अपने जुनून से बदल देता है। ऐसी ही कहानी को पर्दे पर उतारती निर्देशक हरीश शर्मा की डॉक्यूमेंट्री ‘ब्राज़ील इन बनारस: ए भैरब दत्त स्टोरी’ का विशेष प्रदर्शन 11वें देहरादून इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के दौरान सिल्वरसिटी मल्टीप्लेक्स, देहरादून में किया गया।

स्क्रीनिंग के बाद फिल्म को दर्शकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और स्टैंडिंग ओवेशन के साथ इसका स्वागत किया गया। फिल्म समाप्त होने के बाद माहौल भावुक था। दर्शक डॉक्यूमेंट्री के केंद्रीय किरदार, फुटबॉलर और कोच भैरब दत्त से मिलने और उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए उत्साहित दिखाई दिए। लोगों ने विशेष रूप से उनकी वर्षों की फुटबॉल साधना और बिना किसी स्वार्थ के युवा खिलाड़ियों को तैयार करने के प्रयासों की सराहना की।

‘ब्राज़ील इन बनारस’ सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धियों का दस्तावेज नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की कहानी है जिसने फुटबॉल को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से निकले भैरब दत्त का सफर उन्हें बनारस तक ले गया, जहां उन्होंने अपनी फुटबॉल नर्सरी अकादमी के माध्यम से नई पीढ़ी को खेल से जोड़ने का काम किया।

फिल्म में उनके संघर्ष, खेल के प्रति समर्पण और युवा खिलाड़ियों को तैयार करने की यात्रा को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। सीमित संसाधनों के बावजूद खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराना उनकी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

स्क्रीनिंग के बाद निर्देशक हरीश शर्मा ने भैरब दत्त की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों राज्य सरकारों से सम्मान मिला है। शर्मा के अनुसार, भैरब दत्त ने लगातार 12 वर्षों तक संतोष ट्रॉफी में फुटबॉल खेला और उनकी नर्सरी अकादमी से जुड़े करीब 500–700 बच्चों में से अनेक खिलाड़ी आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे।

डॉक्यूमेंट्री का सबसे प्रभावशाली पक्ष भैरब दत्त की व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे जाकर उनके कोच और मेंटर के रूप में किए गए काम को सामने लाना है। स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया भी इसी भावना को दर्शाती दिखाई दी।

कई दर्शकों ने भैरब दत्त से बातचीत की, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं और युवा फुटबॉल खिलाड़ियों को तैयार करने के उनके प्रयासों की सराहना की। फिल्म मानो एक सवाल छोड़ती है कि किसी खिलाड़ी की असली उपलब्धि उसके अपने रिकॉर्ड हैं या वे खिलाड़ी जिन्हें वह अपने बाद तैयार करके जाता है?

फेस्टिवल के दौरान निर्देशक हरीश शर्मा और भैरब दत्त को ‘ब्राज़ील इन बनारस: ए भैरब दत्त स्टोरी’ के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उस कहानी के लिए भी महत्वपूर्ण रहा, जो भारतीय फुटबॉल के एक ऐसे जमीनी अध्याय को सामने लाती है जो आमतौर पर राष्ट्रीय सुर्खियों से दूर रहा है। डॉक्यूमेंट्री के निर्माता दीपक पारीक हैं। कहानी, पटकथा और निर्देशन हरीश शर्मा, सिनेमैटोग्राफी मनिका सिसोदिया तथा एडिटिंग इरशाद दिल्लीवाला की है।

‘ब्राजील इन बनारस’ की मूल भावना इसकी टैगलाइन में समाहित है— “Some stories are not lived. They are played.” पिथौरागढ़ की पहाड़ियों से शुरू होकर बनारस के फुटबॉल मैदानों तक पहुंची भैरब दत्त की कहानी बताती है कि एक खिलाड़ी मैदान छोड़ने के बाद भी खेलना बंद नहीं करता। वह अपने अनुभव, अनुशासन और सपनों को अगली पीढ़ी में उतारकर अपनी पारी जारी रखता है। और शायद यही वजह थी कि फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक अपनी सीटों पर बैठे नहीं रहे, वे खड़े हुए और भैरब दत्त की इस लंबी फुटबॉल यात्रा का तालियों से सम्मान किया।