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Bindu Madhav Temple of Varanasi : आदिविश्वेश्वर मंदिर के बाद ध्वस्त किया गया था बिंदु माधव मंदिर

15 रबीउल आखिर यानी 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को खबर मिली कि उसकी आज्ञानुसार विश्ववनाथ मंदिर ध्वस्त करा दिया गया है। इसके तीन महीने के भीतर काशी में दो और सबसे बड़े तथा भव्य मंदिर बिंदु माधव तथा कृति वासेश्वर मंदिर भी ध्वस्त कर दिए गए।

By Saurabh ChakravartyEdited By: Published: Fri, 03 Jun 2022 08:49 PM (IST)Updated: Fri, 03 Jun 2022 08:49 PM (IST)
बिंदु माधव मंदिर पर धरहरा की आलमगीर मस्जिद आज भी कायम है।

वाराणसी, शैलेश अस्थाना : औरंगजेब के समकालीन साकी मुस्तैद खां ने ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ में लिखा है कि 17 जिलकदा हिजरी 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 के दिन के औरंगजेब के आदेश के क्रम में काशी में तमाम मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद 15 रबीउल आखिर यानी 2 सितंबर, 1669 को औरंगजेब को खबर मिली कि उसकी आज्ञानुसार काशी में विश्ववनाथ मंदिर ध्वस्त करा दिया गया है और उस पर ज्ञानवापी मस्जिद उठा दी गई है। इसके तीन महीने के भीतर काशी में दो और सबसे बड़े तथा भव्य मंदिर बिंदु माधव तथा कृति वासेश्वर मंदिर भी ध्वस्त कर दिए गए और उन पर मस्जिदें तान दी गईं। बिंदु माधव मंदिर पर धरहरा की आलमगीर मस्जिद आज भी कायम है। श्रद्धालुओं ने न्यायालय में याचिका देकर इसमे भी पूजा-पाठ की अनुमति मांगी है।

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1665 में काशी आए फ्रांसीसी यात्री तावर्निये ने इसकी भव्यता का वर्णन करते हुए इसे पुरी के जगन्नाथ मंदिर जैसा बताया है। उसके अनुसार यह मंदिर पंचगंगा घाट से रामघाट तक फैला हुआ था। इसके अहाते के अंदर श्रीराम और मंगला गौरी मंदिर तथा पुजारियों के रहने के मकान थे। मंदिर के धरहरों (मीनार जैसे ऊंचे शिखर) की चौड़ाई जमीन पर सवा आठ फुट व शिखर पर साढ़े सात फुट थी। इनकी ऊंचाई 147 फुट दो इंच थी। आज भी मस्जिद की कुरसी गंगा से करीब 90 फुट ऊंचाई पर है।

गहड़वाल शासकों ने कराया था निर्माण

बीएचयू के पुरातत्वविद व प्राचीन इतिहासकार प्रो. मारुतिनंदन तिवारी बताते हैं कि सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण से लेकर वृहद पुराण, वैवर्त पुराण और स्कंदपुराण तक में काशी में बिंदु माधव तीर्थ का उल्लेख है। इस प्रकार ऐतिहासिक रूप से देखें तो गुप्तकाल से ही इस मंदिर का वर्णन पुस्तकों में आता है। निश्चित रूप से वह उस समय काफी भव्य रहा होगा। काशी के अध्येता, भूगोलविद प्रो. राणा पीबी सिंह बताते हैं कि 11वीं सदी में गाहड़वाल वंश के क्षत्रिय राजाओं का काशी में शासन था। मंदिर में मिले शिलालेख में मिलता है कि मंदिर का निर्माण उस काल में उन्हीं के द्वारा कराया गया था। बाद में जयपुर के राजा मानसिंह ने 15वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण कराया। इस मस्जिद के भीतर भी शंख-पुष्प, सूंड़, कमल, घंटी के अंकन मिलते हैं।

मिलता है 42 शिवलिंगों और दो विष्णु मंदिरों का उल्लेख

शैव का प्रभाव होने के पूर्व प्राचीन काशी में वैष्णव मत प्रभावी था। यूं तो स्कंदपुराण के काशी खंड में 42 शिवलिंगों और दो विष्णु मंदिरों का उल्लेख मिलता है। जिनमें पंचगंगा घाट पर बिंदु माधव मंदिर व आदि केशव घाट पर भगवान विष्णु के मंदिर की बात आती है।

गोस्वामी तुलसीदा से ने विनयपत्रिका में किया है वर्णन

गोस्वामी तुलसीदास के समय में बिंदु माधव मंदिर मौजूद था। उन्होंने विनयपत्रिका के 49वें पद से लेकर 61वें पद तक मंदिर व उसमें स्थापित विष्णु प्रतिमा के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है। 61वें पद में वह लिखते हैं कि - “सकल सुखकंद आनंदवन-पुण्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व विपतहारी...”। 1901 में भारतीय पुरातत्व के बहुत बड़े ज्ञाता ब्रिटिश प्रोफेसर आलचिन ने अंग्रेजी भाषा में इन पदों का अनुवाद कर मंदिर व प्रतिमा की भव्यता को सटीक बताया है। तावर्निये ने भी इसके सौंदर्य का अद्भुत वर्णन किया है।

दो सौ वर्ष बाद मिला प्रतिमा को स्थान

प्रो. मारुतिनंदन तिवारी बताते हैं कि बिंदु माधव मंदिर के ध्वंस के बाद दिव्य सौंदर्य से युक्त भगवान विष्णु की प्रतिमा उपेक्षित पड़ी रही। लगभग दो सौ वर्ष बाद मराठों का प्रभुत्व बढ़ने पर 18वीं सदी के अंत या 19वीं सदी के आरंभ में सतारा राज्य के औभ स्टेट के महाराज भावन राव ने आलमगीर मस्जिद के बगल में एक हवेली में मंदिर बनवाया और उसमें भगवान विष्णु की उस दिव्य प्रतिमा को स्थापित कराया। कार्तिक मास में पंचगंगा घाट पर नहाकर बिंदु माधव के दर्शन करने की मान्यता है।


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