BHU में 6 फीट लंबे कंकाल पर शोध शुरू, राजघाट उत्खनन से मिले अवशेषों की DNA और आइसोटोप जांच
वाराणसी के राजघाट उत्खनन से मिले प्राचीन मानव कंकाल पर बीएचयू में अध्ययन शुरू हो गया है।


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संग्राम सिंह, वाराणसी। काशी के प्राचीन इतिहास से जुड़े एक मानव कंकाल के रहस्यों से अब आधुनिक विज्ञान पर्दा उठाएगा। गंगा-वरुणा संगम क्षेत्र के ऐतिहासिक राजघाट उत्खनन से मिले करीब छह फीट लंबे कंकाल पर बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में अध्ययन शुरू हो चुका है।
दशकों से सुरक्षित इस कंकाल की प्राचीन डीएनए (एडीएनए), रेडियोकार्बन डेटिंग और आइसोटोप तकनीक से जांच की जा रही है।
रेडियोकार्बन डेटिंग से कंकाल का कालक्रम और उम्र निर्धारित होगी। प्राचीन डीएनए से उसकी आनुवंशिक पृष्ठभूमि और तत्कालीन मानव आबादी से जैविक संबंधों का पता चलेगा। वहीं आइसोटोप विश्लेषण से उसके खान-पान, आहार और जीवन-शैली की जानकारी मिलेगी।
इससे काशी में रहने वाली उस दौर की आबादी के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जांच के परिणाम आने से पहले इस कंकाल की तुलना राखीगढ़ी के करीब पांच हजार वर्ष पुराने मानव अवशेषों से करना जल्दबाजी होगी। रेडियोकार्बन डेटिंग की रिपोर्ट आने के बाद ही कंकाल के काल और काशी की तत्कालीन आबादी के ऐतिहासिक संदर्भ को स्पष्ट किया जा सकेगा।
1940 से जारी है राजघाट की पुरातात्विक खोज
राजघाट में पुरातात्विक उत्खनन की शुरुआत 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के दौरान हुई थी। इसके बाद बीएचयू के प्रो. एके नारायण, टीएन राय और 2013-14 में प्रो. विदुला जायसवाल व डॉ. बीआर मणि के निर्देशन में हुए उत्खनन से प्राचीन वाराणसी के कई पहलू सामने आए। 1940 के उत्खनन में कृष्णदेव को गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि की मुहर मिली थी, जिस पर वाराणसी के नगर प्रशासन का उल्लेख है।
उत्खनन में रक्षा प्राचीर, वलय-कूप, ईंटों की आवासीय संरचनाएं, उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड, धातु की वस्तुएं, मनके तथा मानव-पशु आकृतियों वाली मृण्मूर्तियां भी मिली हैं। यह अवशेष तत्कालीन नगरीय नियोजन, जल प्रबंधन, कला और शिल्प की समृद्ध परंपरा की जानकारी देते हैं।
बीएचयू के प्रो. अतुल त्रिपाठी के अनुसार, राजघाट मध्य गंगा घाटी में काशी के उद्भव, व्यापारिक नेटवर्क, कला, शिल्प और प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का महत्वपूर्ण आधार है। अब डीएनए और आइसोटोप तकनीक के इस्तेमाल से काशी के प्राचीन इतिहास की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।
