कबाड़ से काशी के आसमान तक उड़ान भर सकता है 80 साल पुराना 'परशुराम'
काशी के आसमान में भारतीय वायुसेना का ऐतिहासिक डकोटा विमान 'परशुराम' एयर शो में उड़ान भर सकता है। यह 80 ...और पढ़ें

काशी के आसमान में गूंजेगी 80 साल पुराने 'परशुराम' डकोटा विमान की गर्जना।
HighLights
काशी एयर शो में डकोटा 'परशुराम' की संभावित उड़ान।
80 साल पुराना विमान, कबाड़ से भारतीय वायुसेना का गौरव।
कश्मीर एयरलिफ्ट और ऐतिहासिक VP-905 क्रमांक से जुड़ाव।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। आधुनिक लड़ाकू विमानों की गर्जना के बीच काशी के आसमान में इतिहास के पंख भी खुल सकते हैं। गंगा के ऊपर प्रस्तावित एयर शो में भारतीय वायुसेना का विंटेज विमान डकोटा 'परशुराम' भी उड़ान भर सकता है। करीब आठ दशक पुराने इस विमान की कहानी किसी रोमांचक सफर से कम नहीं है।
अमेरिका में बना, ब्रिटिश वायुसेना में सेवा दे चुका और बाद में नागरिक विमानन में इस्तेमाल हुआ यह विमान एक समय कबाड़ की स्थिति में पहुंच गया था। फिर इसे खरीदा गया, ब्रिटेन में रिपेयर किया गया और भारतीय वायुसेना को सौंप दिया गया। अब यह वायुसेना की ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। हालांकि, वाराणसी एयर शो में इसकी भागीदारी की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।

वर्ष 2011 में तत्कालीन राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने विदेश में कबाड़ की स्थिति में पड़े इस डकोटा को खरीदा। ब्रिटेन में इसकी रिपेरिंग कराई गई और इसे फिर उड़ान योग्य बनाया गया। 13 फरवरी 2018 को इसे भारतीय वायुसेना को भेंट किया गया। इसके बाद विमान ने 17 अप्रैल 2018 को ब्रिटेन से भारत के लिए उड़ान भरी और 26 अप्रैल को हिंडन एयरफोर्स स्टेशन पहुंचा। इसे 'परशुराम' नाम और वीपी-905 क्रमांक दिया गया। वर्ष 2018 में हिंडन में एयरफोर्स डे और 2019 में बेंगलुरु के एयरो इंडिया में यह उड़ान भर चुका है।
विमान का सफर
1944 : अमेरिका में डगलस डीसी-3 डकोटा का निर्माण हुआ।
1945 : ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स की सेवा में शामिल हुआ।
बाद के वर्ष : सैन्य सेवा से निकलकर नागरिक विमानन में पहुंचा।
2011 : राजीव चंद्रशेखर ने इसे कबाड़ की स्थिति में खरीदा।
13 फरवरी 2018 : भारतीय वायुसेना को भेंट किया गया।
26 अप्रैल 2018 : ब्रिटेन से उड़ान भरकर भारत पहुंचा।

पिता की याद में खरीदा विमान
राजीव चंद्रशेखर के पिता एयर कमोडोर एमके चंद्रशेखर भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे और अपने शुरुआती करियर में डकोटा विमान उड़ाते थे। पिता के वायुसेना से जुड़ाव और इस विमान के ऐतिहासिक महत्व ने राजीव चंद्रशेखर को इसे संरक्षित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विमान को खरीदकर रिपेयर कराया और भारतीय वायुसेना को भेंट कर दिया, ताकि उसकी विरासत सुरक्षित रह सके।
वीपी-905 नंबर के पीछे कश्मीर एयरलिफ्ट की कहानी
27 अक्टूबर 1947 को भारतीय वायुसेना के डकोटा विमानों ने दिल्ली से श्रीनगर तक सैनिकों को पहुंचाने का ऐतिहासिक अभियान शुरू किया था। पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के बाद कश्मीर की सुरक्षा के लिए भारतीय सेना की तत्काल तैनाती जरूरी थी। इस अभियान में नंबर 12 स्क्वाड्रन के डकोटा विमानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक विमान वीपी-905 भी इसी अभियान से जुड़ा था। इसी ऐतिहासिक योगदान को सम्मान देने के लिए वर्तमान परशुराम को वीपी-905 क्रमांक दिया गया।

10 डकोटा विमानों के साथ उतरी थी 12 स्क्वाड्रन
1947 में नंबर 12 स्क्वाड्रन के पास 10 डकोटा विमान थे। कश्मीर में सैनिकों को पहुंचाने के साथ-साथ इन विमानों ने रसद और जरूरी सामग्री की आपूर्ति में भी अहम भूमिका निभाई। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल था, ऐसे में डकोटा विमानों ने सेना की आवाजाही को गति दी। श्रीनगर में सैनिकों की शुरुआती तैनाती भारतीय वायुसेना के परिवहन विमानों की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्रवाइयों में गिनी जाती है।
