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काशी का अहिल्याबाई घाट: महारानी अहिल्याबाई होल्कर की ऐतिहासिक देन और स्थापत्य कला

By Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
Published: Fri, 30 Oct 2026 08:51 PM (IST)

काशी के गंगा तट पर स्थित अहिल्याबाई घाट भारतीय संस्कृति और स्थापत्य का जीवंत प्रमाण है। यह घाट इंदौर की ...और पढ़ें

अहिल्याबाई घाट ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।

अहिल्याबाई घाट ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।

HighLights

  1. अहिल्याबाई घाट काशी की स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक।

  2. महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने घाट का निर्माण कराया, विश्वनाथ मंदिर पुनर्निर्माण।

  3. घाट पर विशाल महल, शिव मंदिर, और यात्रियों के लिए सुविधाएं मौजूद।

प्रो. मारुति नंदन तिवारी, जागरण वाराणसी। काशी के गंगा तट पर बसे घाट केवल स्नान और पूजा के स्थल नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति, कला, स्थापत्य और परंपराओं के जीवंत दस्तावेज हैं। इन घाटों की सीढ़ियों और इमारतों में देश के अलग-अलग राज्यों के शासकों की आस्था और उनके सांस्कृतिक योगदान की छाप दिखाई देती है। इस विरासत को आकार देने में महिला शासिकाओं की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं रही है।

इनमें इंदौर के होलकर राजवंश की महारानी अहिल्याबाई का नाम विशेष आदर के साथ लिया जाता है। काशी में उनके योगदान की सबसे बड़ी पहचान श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी है। इसके साथ ही उन्होंने गंगा तट पर कई घाटों का भी निर्माण कराया। अहिल्याबाई घाट इसी ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।

रानी अहिल्याबाई ने 1785 ई. में दशाश्वमेध और शीतला घाट तथा मुंशी घाट के बीच प्रयाग घाट का निर्माण कराया था। इससे पहले यह केवल गिरी घाट के नाम से जाना जाता था। जेम्स प्रिंसेप ने 1831 में इसका उल्लेख केवल गिरी घाट के रूप में किया, जबकि 1868 में शेरिंग ने इसे अहिल्याबाई घाट नाम से संदर्भित किया। घाट की सीढ़ियां, ऊपर स्थित विशाल महल, बाड़ा और उसमें बना हनुमान मंदिर इसकी विशिष्ट पहचान हैं। मंदिर की देवकुलिकाओं में 18वीं शती के कई देव विग्रह स्थापित हैं।

घाट पर अहिल्याबाई का झरोखों से सुसज्जित विशाल महल, बाड़ा और नागर शैली के दो शिव मंदिर भी हैं। इन मंदिरों में मंडप, गर्भगृह और शिखर की पारंपरिक स्थापत्य संरचना दिखाई देती है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित हैं। स्नानार्थियों की सुविधा के लिए वस्त्र बदलने को कई मढ़ियां बनाई गई हैं। महल के नीचे घाट की ओर बने तीन बरामदे यात्रियों के विश्राम के लिए निर्मित किए गए थे। हालांकि, वर्तमान में ये घाटिया और मल्लाहों के उपयोग में हैं।

धार्मिक पर्वों की दृष्टि से इस घाट का कोई विशेष आयोजन नहीं है, फिर भी पक्का, स्वच्छ और दशाश्वमेध के निकट होने के कारण काशीवासी यहां स्नान और गंगा दर्शन के लिए आते हैं। यहां से शाम की गंगा आरती का भव्य दृश्य भी दिखाई देता है। संध्या समय बंगाली समाज की विधवा महिलाएं यहां भजन-कीर्तन के लिए जुटती हैं। इस तरह अहिल्याबाई घाट आज भी इतिहास, स्थापत्य, आस्था और लोकपरंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है।

(लेखक बीएचयू में इतिहास कला विभाग में एमेरिटस प्रोफेसर तथा 'आर्ट हिस्ट्री कांग्रेस' के अध्यक्ष हैं।)

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