यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 29, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
निर्मल वर्मा की 'धुंध से उठती धुन' और फणीश्वरनाथ रेणु की 'ठुमरी' में यात्रा वृतांत और कहानियों का खजाना
सभ्यता के प्रश्न और अस्तित्व की खोज में डूबते रचनात्मकता के संकट को धुंध से उठती धुन में निर्मल वर्मा ...और पढ़ें

नई दिल्ली, यतीन्द्र मिश्र। निर्मल वर्मा का गद्य अपनी प्रांजल भाषा और सुचिंतित विचारणा के चलते अलग से चमकता है। ये देखने वाली बात है कि उनके लेखन में विचार के साथ ही भाषा भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कथ्य की तरह ही विषय को खोलने का एक बड़ा आयाम निर्मित करती है। हमारी स्वाधीनता के हीरक जयंती वर्ष में जिन प्रमुख कृतियों की चर्चा हमने लगातार की है, उसमें आधुनिक हिंदी के निर्माताओं में निर्मल वर्मा का स्मरण सर्वाधिक प्रासंगिक जान पड़ता है। उनके विपुल लेखन का दायरा भी कहानियों, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत से लेकर वैचारिक गद्य, डायरी और संस्मरणों तक पसरा हुआ है।
ऐसे में, उनकी अंत: प्रक्रियाओं की बेहतरीन कृति, जिसे डायरीनुमा शक्ल में रूपायित किया गया है, को उनके लेखन का एक प्रमुख बिंदु मानकर देखा जा सकता है। आज की समीक्षित किताब ‘धुंध से उठती धुन’ निर्मल वर्मा के सदाबहार लेखन का अनन्य उदाहरण बनकर उभरती है। खासकर, इस दृष्टि से भी कि उनकी सोच का रास्ता भारतीय अर्थों में संपूर्णता पाता है, जिसके लिए अनूठे ढंग से वे पश्चिमी सभ्यता के संदर्भों से एक समावेशी समझ विकसित करते हैं, जो मनुष्य की अंत: प्रज्ञा को दीप्त करने में लगातार सक्रिय दिखाई देता है। यह सारे जतन करते हुए निर्मल वर्मा अपने वजूद के होने को बार-बार प्रश्नांकित करते हैं।
जैसे, वे ये मानते हैं कि जीवन और संसार का एक अपरिभाषित व्यवहार सदैव जागृत रहता है, जिसे हौले से टटोलकर हम मनुष्यता के चरम प्रश्नों को हल कर सकते हैं। इस किताब की भूमिका में वे कहते हैं, जो खुद से किया गया प्रश्न ही है- ‘जब मेरा बाकी लिखना छूट जाता है, अर्से से छूटी हुई डायरी शुरू हो जाती है। क्या यह एक तरह की क्षतिपूर्ति है? घर के अभाव को बेघर अनुभवों से भरने की लालसा?’ ये कितना बड़ा प्रश्न या संशय है कि हम खुद को ढूंढ़ने में उस अभाव की पूर्णता तलाशते हैं, जिसके लिए इस जीवन को कई तरह से भरने और संवारने में खर्च कर देते हैं।
22 साल (1973-1995) के दरम्यान फैले हुए देश-परदेस की यात्राओं के अनुभवों, बौद्धिकों-दार्शनिकों की लिखी पोथियों के अध्ययन और दुनिया भर के संगीत को सुनकर स्वायत्त की हुई संवेदनशीलता को इतनी तरलता से आत्मिक भाषा में रूपांतरित करने का कौशल, रचनाकार ने इस किताब में जिस ढंग से अभिव्यक्त किया है, वह अप्रतिम है। इसे पढ़ते हुए सहज ही अज्ञेय की डायरी ‘शेषा’, नवनीता देवसेन की यात्रा पुस्तक ‘किस पथ आए तुम्हारी करुणा’ और हजारी प्रसाद द्विवेदी की ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ की सुध आती है।
इन किताबों से हमारे अंतरंग समाज का वह पक्ष उद्भासित होता है, जो सूक्ष्म और स्थूल के मध्य एक झीने पर्दे की तरह समय प्रवाह में तरंगित होता रहता है। निर्मल जी इस पुस्तक के गलियारों में बीथोवन, बाख, मोत्जार्त के संगीत की सिंफनी से प्रकाश वृत्त उकेरते हैं, तो कई दफा आत्मसंशय को कुरेदने के लिए आनंद कुमारस्वामी, रिल्के, रमण महर्षि, सिमोन वेल, डा. राय बर्मन, वी. एस. नायपाल और तुर्गनेव की शरण में जाते हैं। दरअसल, यह डायरी एक ऐसे अंतहीन फलसफे का आमंत्रण है, जिसे साधे बगैर किसी भिक्षु या सनातनी की कंदरा या गुफा में साधना के लिए प्रवेश नहीं मिल सकता। अपने आत्म साक्षात्कार के लिए हमें जिन प्रत्ययों की आवश्यकता होती है, वो सब सहेजने के लिए धुंध से उठती धुन से गुजरना राहत भरा काम हो सकता है।
किताब की सबसे बड़ी सफलता इसका कई परतों में चलने वाला विचार पगा गद्य है, जिसे कहीं से भी कभी भी पढ़ा जा सकता है। सुभाषितों की शब्दावली में लिखी गई यह कृति एक ऐसे दार्शनिक आख्यान की जमीन तैयार करती है कि हम हतप्रभ से रह जाते हैं, ये देखते हुए कि जीवन की छोटी-छोटी बातों के आलोक में पूरा जीवन दर्शन समाया हुआ है। कुछ सूक्तियों से ये बात और भी समझी जा सकती है- ‘हम एक ऐसी सभ्यता में रहते हैं, जिसने सत्य को खोजने के लिए सब रास्तों को खोल दिया है, किंतु उसे पाने की समस्त संभावनाओं को नष्ट कर दिया है।’, ‘कला में धर्म की तरह, सीमाबद्ध संसार पर शाश्वत का प्रवेश है।’, ‘मनुष्य के भीतर जो पशु है, उसकी तुलना बाहर के किसी भी पशु से नहीं की जा सकती।
मनुष्य पशु से ऊपर उठने का बहाना करता है और जब गिरता है तो उसकी क्रूरता प्रकृति की सब मर्यादाओं को तोड़ती जाती है- इसीलिए वह अपने स्वभाव से पाशविक है, पशुवत नहीं।’ ऐसे ढेरों सीमांतों पर ठिठककर सोचने की जो दिशा मिलती है, वही इस पुस्तक का सर्वोत्तम है, जिसे एक बड़े हासिल की तरह लेना चाहिए। आपने यदि इस किताब को नहीं पढ़ा है, तो पाठकीयता के एक दुर्लभ सुख से वंचित हैंर्। ंहदी में मौलिक लेखन की एक ऐसी सुघड़ पोथी, जिसकी दार्शनिकता के झिलमिल में सभ्यता के शाश्वत सवालों को सुलझाने की युक्ति मिलती है। अंत:प्रक्रियाओं की यह किताब हमारे अवचेतन की ढेरों गांठों को भी खोलने का मार्ग दिखाती है।
धुंध से उठती धुन
निर्मल वर्मा
डायरी/नोट्स/यात्रा वृत्तांत
पहला संस्करण, 1977
पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2019
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य: 295 रुपए
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मयूरपंख : जीवन राग का गान करती कहानियां
अमर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानियों का संकलन ‘ठुमरी‘ इस अर्थ में अविस्मरणीय है कि इन कथाओं के माध्यम से उन्होंने मानवीय रिश्तों की कोमलतम भावनाओं का रागात्मक विस्तार किया है। ‘ठुमरी’ की कहानियां जीवन के स्पंदन, उसकी लोकलय और जातीय स्मृतियों के मोहपाश का आकलन हैं, जिनके सूत्र सामाजिक व्यवहार के अंतरंग हिस्सों का पता देते हैं। फिर वह ‘मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ हो या ‘लाल पान की बेगम’, ‘रसप्रिया’ या कि ‘पंचलाइट’।
इन बहुप्रसिद्ध और प्रशंसित कहानियों में सांगीतिक विचार की तरह एक सुर का कई बार दोहराया गया आवर्तन राग विस्तार की सुंदरता बरजता है। इस आधार पर उनके ढेरों किरदार- हीराबाई, हिरामन, महुआ घटवारिन, मिरदंगिया, बिरजू की मां सभी अपने चरित्रों के बड़े आकाश में संवेदना का वो संगीत रचते हैं, जिसकी शिनाख्त ठुमरी की तर्ज पर मन के भीतर दर्ज होती रहती है। रेणु यहां पीड़ा को अंतरलय की तरह गूंथते हुए उस आनंद का सृजन करते हैं, जिसके अंत:पुर में अवसाद की महानदी बहती है।
ठुमरी
फणीश्वरनाथ रेणु
कहानी संग्रह
पहला संस्करण, 1959
पुनर्प्रकाशित संस्करण, 2021
राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली
मूल्य: 199 रुपए