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आईआईटी बीएचयू के शोधकर्ताओं का कमाल, ग्रेफीन नैनोकंपोजिट से अपशिष्ट जल से 92% विषाक्त डाई साफ

By abhishek sharma Edited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 04 Nov 2026 11:00 AM (IST)

आईआईटी (बीएचयू) और पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से हानिकारक डाई हटाने के लिए एक उन्नत ग्रेफीन-आधारित ...और पढ़ें

आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय का कमाल: ग्रेफीन नैनोकंपोजिट से औद्योगिक अपशिष्ट जल में 92% डाई साफ।

आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय का कमाल: ग्रेफीन नैनोकंपोजिट से औद्योगिक अपशिष्ट जल में 92% डाई साफ।

HighLights

  1. ग्रेफीन-आधारित नैनोकंपोजिट औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन के लिए विकसित।

  2. 'एरियोक्रोम ब्लैक टी' डाई को 92.91% तक हटाता है।

  3. आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की उपलब्धि।

जागरण संवाददाता, वाराणसी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी और पारुल विश्वविद्यालय, वडोदरा के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ी सफलता हासिल की है। दोनों संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक उन्नत ग्रेफीन-आधारित नैनोकंपोजिट विकसित किया है, जो औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद बेहद हानिकारक और पर्यावरण के लिए खतरनाक डाई को तेजी से साफ करने में सक्षम है। इस नई तकनीक ने अनुकूलित परिस्थितियों में 'एरियोक्रोम ब्लैक टी' नामक विषाक्त डाई को 92.91 प्रतिशत तक हटाने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।

यह संयुक्त शोध आईआईटी (बीएचयू) के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय (School of Biochemical Engineering) और पारुल विश्वविद्यालय के पारुल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किया गया है। शोध दल में आईआईटी (बीएचयू) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा के साथ-साथ पारुल विश्वविद्यालय के आलोक तिवारी, गौरांग दामले, डॉ. विशाल सांधवार, डॉ. शिवेंदु सक्सेना और दीक्षा सक्सेना शामिल हैं।

कैसे तैयार किया गया यह खास नैनोकंपोजिट?

शोधकर्ताओं ने टिन ऑक्साइड (SnO₂), ग्रेफीन और उच्च विद्युत चालकता वाले पॉलीमर पॉलीपाइरोल को आपस में मिलाकर एक नवीन नैनोकंपोजिट तैयार किया है। इसे एक विशेष 'सिंगल-पॉट संश्लेषण' प्रक्रिया के जरिए विकसित किया गया है। इस अनोखी सामग्री की खासियत यह है कि इसमें मौजूद पॉलीपाइरोल की परत कणों को आपस में चिपकने या एकत्रित होने से रोकती है। इससे डाई के अणुओं को अवशोषित करने के लिए सतह पर अधिक सक्रिय स्थल (Active Sites) मिल जाते हैं, जिससे शोधन प्रक्रिया बेहद प्रभावी हो जाती है।

कपड़ा उद्योग के कचरे से जुड़ी बड़ी चुनौती

'एरियोक्रोम ब्लैक टी' एक व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली एजो डाई है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कपड़ा (टेक्स्टाइल) उद्योगों में होता है। अपनी जटिल रासायनिक संरचना के कारण यह डाई प्राकृतिक रूप से अपघटित नहीं होती और पर्यावरण में लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे अपशिष्ट जल का शोधन करना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। फोटोकैटेलिसिस और विद्युत-रासायनिक जैसी पारंपरिक तकनीकें प्रभावी होने के बावजूद काफी खर्चीली साबित होती हैं। इसे ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने पूरी तरह से 'अवशोषण' (Adsorption) आधारित इस किफायती तकनीक पर जोर दिया।

सांख्यिकीय विश्लेषण और बेहतरीन परिणाम

इस अध्ययन के दौरान 'रिस्पॉन्स सरफेस मेथडोलॉजी' (Response Surface Methodology) नामक उन्नत सांख्यिकीय तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसकी मदद से पीएच मान, अवशोषक की मात्रा, डाई की सांद्रता, संपर्क समय और तापमान जैसे सभी जरूरी कारकों का बारीकी से विश्लेषण किया गया।

अनुकूलित परिस्थितियों में इस नैनोकंपोजिट ने 92.91 प्रतिशत डाई हटाने की क्षमता दिखाई, जो मॉडल के अनुमान (92.90%) के लगभग बराबर रही। इस पूरी प्रक्रिया में महज 30 से 40 मिनट के भीतर ही अवशोषण संतुलन प्राप्त हो जाता है, जो इसकी तीव्र कार्यक्षमता को दर्शाता है। इस सामग्री की अधिकतम अवशोषण क्षमता 434.8 मिलीग्राम प्रति ग्राम दर्ज की गई है, जो इस श्रेणी के अन्य अवशोषकों के मुकाबले कहीं अधिक बेहतर है।

पुनः उपयोग और भविष्य की संभावनाएं

पर्यावरण और लागत दोनों दृष्टियों से इस सामग्री के परीक्षण में पाया गया कि छह बार उपयोग के बाद भी यह लगभग 77 प्रतिशत तक डाई हटाने की क्षमता बनाए रखती है। हालांकि, सोडियम हाइड्रॉक्साइड के जरिए इसके पुनर्जनन की प्रक्रिया में दक्षता थोड़ी कम जरूर हुई, जिस पर शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी दीर्घकालिक उपयोगिता को और बढ़ाने के लिए भविष्य में और अधिक उन्नत तकनीकों पर काम किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं, जिसका प्रकाशन स्प्रिंगर नेचर द्वारा किया जाता है।

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