जासं, वाराणसी : जल संरक्षण की दिशा में काशी वन्य जीव प्रभाग ने भी कदम बढ़ा दिया है और महीने में 80 हजार लीटर पानी की बचत कर रहा है। सारनाथ के कछुआ पुनर्वास केंद्र के कृत्रिम तालाब का पानी पहले प्रतिदिन बदला जाता था। प्रतिमाह एक लाख बीस हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती थी, इसे बचाने के लिए वन्य जीव प्रभाग एवं भारतीय वन्य जीव संस्थान के कर्मचारियों ने बायो फिल्टर सिस्टम लगाया जिससे अब प्रति माह 80 हजार लीटर पानी की बचत हो रही है।

कछुआ पुनवास केंद्र में स्थित 1400 वर्ग फीट क्षेत्रफल के कृतिम तालाब में कई प्रजाति के छोटे बड़े 119 कछुए रहते हैं। वन्य जीव प्रभाग के वन रक्षक निशिकात को पानी की बर्बादी ठीक नहीं लगी तो कभी-कभी तो मोटर लगाकर तालाब का पानी पेड़-पौधों में डलवा देते थे, कई हजार लीटर पानी बर्बाद होता था। इनके दिमाग में आया कि बायो फिल्टर सिस्टम के माध्यम से पानी को बचाया जा सकता है। निशिकात ने वन क्षेत्राधिकारी महेंद्र नाथ यादव एवं भारतीय वन्य जीव संस्थान के डा. अनिमेष तालुकदार को सिस्टम के बारे में बताया। उसके बाद निशिकात ने तालाब में चार प्लास्टिक के बड़े टब को रखा। अब ऊपर से पहले टब में पतली जाली, लाल बालू, छोटी गिट्टी, दूसरे टब में भी बालू, गिट्टी, तीसरे टब में लाल बालू, छोटी गिट्टी, जाली एवं अंतिम टब में कोयला, गिट्टी से छन कर पानी पुन: तालाब में जाता है। इससे पानी तो साफ होता ही है, वहीं वाटर के रिसाइकिल होने से पानी शुद्ध व ताजा पानी के साथ कछुओं को शुद्ध ऑक्सीजन भी मिलने लगा। पूरे सिस्टम पर मात्र दस हजार रुपये का खर्च आया।

वन क्षेत्राधिकारी महेंद्र नाथ यादव ने बताया कि इस सिस्टम से पानी की बर्बादी नहीं होती तथा तालाब में पानी का बहाव होने से पानी स्वच्छ बना रहता है। अन्य कृत्रिम तालाबों में भी यह सिस्टम लगाने पर विचार किया जा रहा है।

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तालाब के लिए 30 और पौधों के लिए 10 हजार लीटर

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-पहले प्रतिदिन चार हजार लीटर पानी तालाब में भरा जाता था।

-अब प्रतिदिन एक हजार लीटर पानी डाला जाता है।

-महीने में दस हजार लीटर पानी पेड़-पौधों पर खर्च होता है।

Posted By: Jagran

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