वाराणसी : भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग रहा है। औद्योगिक क्रांति और विश्वयुद्ध के बाद पर्यावरण संकट बढ़ा। बाहरी भौतिक पर्यावरण के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक हमारे मन का अहंकार और भोग प्रवृत्ति है। इसके लिए मन को उदात्त भावनाओं से परिपूरित करना आवश्यक है।

काशी विद्यापीठ के संस्कृत विभाग में 'संस्कृत वांड्मय में पर्यावरण चिंतन' विषयक पांच दिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सोमवार को जम्मू विश्वविद्यालय के बौद्ध दर्शन विभाग के पूर्व आचार्य व मुख्य वक्ता प्रो. राकेश मिश्र ने यह बातें कहीं। मुख्य अतिथि व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिदत्त शर्मा ने कहा कि वैदिक वांड्मय में ऋगवेद से ही प्राकृतिक शक्तियों के प्रति श्रद्धा भाव से देवता मानकर स्तुति की परंपरा दिखती है। लौकिक संस्कृत साहित्य में बाल्मीकि रामायण से पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा प्राप्त होती है। प्राचीन कवियों कालिदास, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, बाणभट्ट आदि की रचनाएं पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करती हैं। द्वितीय सत्र में बीएचयू के डा. धीरज किशोर ने चिकित्सा विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में इसका वर्णन किया। अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. उमारानी त्रिपाठी ने की। संचालन डा. कृष्ण दत्त मिश्र ने किया।

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