आलू के साथ शकरकंद की खेती से किसानों को बंपर मुनाफा, कम लागत के चलते कटरी क्षेत्र में मिल रहा बढ़ावा
कटरी क्षेत्र के किसान कम लागत में शकरकंद की खेती से अच्छी आमदनी की उम्मीद कर रहे हैं।

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
कम लागत में शकरकंद की खेती से अच्छी आय।
90-100 दिनों में तैयार होती है यह फसल।
वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान बढ़ा सकते हैं उत्पादन।
जागरण संवाददाता, उन्नाव। कटरी क्षेत्र के किसान कम लागत में शकरकंद की खेती कर अच्छी आमदनी की उम्मीद कर रहे हैं। बाजार में इसकी मांग है और फसल तैयार होते ही स्थानीय तथा आसपास के व्यापारी खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। इससे किसानों को उपज बेचने के लिए भटकना नहीं पड़ता।
आलू के साथ कुछ किसान शकरकंद भी उगा रहे हैं। गंगा के तराई क्षेत्र की जलवायु इसके लिए अनुकूल मानी जाती है। कम पानी और अपेक्षाकृत कम मेहनत में तैयार होने वाली इस फसल के लिए दोमट मिट्टी उपयुक्त है।
पंडित खेड़ा गांव के किसान सुरेश ने एक बीघा खेत में शकरकंद लगाई है। उनके अनुसार फसल 90 से 100 दिनों में तैयार होती है। अब तक करीब पांच हजार रुपये की लागत आई है और एक बीघा में 80 से 90 क्विंटल उपज का अनुमान है। बाजार में शकरकंद 20 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम बिकती है। जंगली सूअर फसल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे उपज की सुरक्षा की चिंता रहती है।
कृषि वैज्ञानिक डाॅ. जय कुमार यादव ने बताया कि उचित जल निकास वाली दोमट मिट्टी में इसकी खेती अच्छी रहती है। खेत की तैयारी, स्वस्थ बेलों का चयन, समय पर खरपतवार नियंत्रण और जरूरत के अनुसार सिंचाई से बेहतर उत्पादन मिल सकता है।
किसान स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुरूप वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर अतिरिक्त आमदनी पा सकते हैं। देखभाल और खरपतवार नियंत्रण के साथ फसल 90 से 100 दिनों में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है।
बारिश के चलते देर से शुरू हुई आलू की बोआई
अधिक वर्षा के कारण इस बार आलू की बोआई देर से शुरू हुई है, जबकि सामान्यतः यह अक्टूबर की शुरुआत में होती है। 60 से 65 दिनों में तैयार होने वाली कच्चे आलू की फसल की बोआई कम होगी।
