सोनभद्र में रेणुका नदी के टापुओं पर सावधानी बरतें पर्यटक, डैम से अचानक आया पानी ले सकता है जान
रेणुका नदी की सुंदरता पर्यटकों को आकर्षित करती है, लेकिन ओबरा डैम से अचानक पानी छोड़े जाने या टरबाइन चलने से जलस्तर बढ़ने का खतरा रहता है।

कम पानी देखकर लोग इसे सुरक्षित मानकर नदी के बीच चले जाते हैं, जिससे जानलेवा हादसे हो सकते हैं; प्रशासन को चेतावनी बोर्ड लगाने की सलाह दी गई है।
HighLights
ओबरा डैम से पानी छोड़ने पर रेणुका नदी में खतरा।
कम जलस्तर को सुरक्षित समझना जानलेवा हो सकता है।
पर्यटकों को नदी के बीच जाने से बचना चाहिए।
जागरण संवाददाता, ओबरा (सोनभद्र)। शाम के समय ढलते सूर्य की सुनहरी किरणों से दमकती रेणुका नदी की लहरें और प्राकृतिक छटा छठ घाट पर आने वाले सैलानियों को बरबस आकर्षित करती हैं। प्रकृति के इस मनोरम दृश्य को कैमरे में कैद करने और मोबाइल से रील बनाने का मोह लोगों को नदी के बीचोंबीच बने ऊंचे टापूनुमा स्थान तक खींच ले जाता है। लेकिन खूबसूरत नजारा देखने की यह चाहत कभी भी जानलेवा साबित हो सकती है। खासकर तब जब लोग नदी के मौजूदा जलस्तर को सुरक्षित मानकर पानी के बीच चले जाते हैं और अचानक तेज धारा के बीच फंस जाते हैं।
दरअसल रेणुका नदी का जलस्तर सामान्य दिनों में काफी कम रहता है। ऐसे में नदी का तल और बीच में बने ऊंचे स्थान आसानी से दिखाई देते हैं। लोग इसे सुरक्षित समझकर टापू तक पहुंच जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि नदी में प्रवाहित होने वाला पानी काफी हद तक ओबरा डैम और उससे जुड़ी जल विद्युत परियोजना की इकाइयों के संचालन पर निर्भर करता है। बिजली की मांग के अनुसार जब इकाइयों से अचानक उत्पादन शुरू होता है तो टरबाइन से निकलने वाला पानी तेजी से नदी में पहुंचता है।
जानकारों का कहना है कि जब ओबरा जल विद्युत इकाइयों की तीनों इकाइयों को पूरी क्षमता से चलाया जाता है तो ऐसे में नदी में लगभग 15800 क्यूसेक से अधिक पानी रेणुका नदी में प्रवाहित होता है। इससे कुछ ही समय में जलस्तर बढ़ने के साथ नदी में पानी का बहाव भी तेज हो सकता है। ऐसे में नदी के बीच मौजूद लोगों को सुरक्षित किनारे तक लौटने का मौका तक मिल पाना मुश्किल हो सकता है। बारिश के मौसम में यह खतरा और बढ़ जाता है।
डैम का जलस्तर बढ़ने पर फाटकों से बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है। वहीं जल विद्युत इकाइयों से होने वाली पानी की निकासी भी नदी के बहाव को बढ़ाती है। इस दौरान नदी का रौद्र रूप देखकर सैलानियों की आवाजाही काफी कम हो जाती है। लेकिन बारिश का मौसम समाप्त होते ही नदी का जलस्तर कम दिखाई देने पर लोगों की भीड़ फिर बढ़ने लगती है।
यही स्थिति सबसे ज्यादा जोखिम पैदा करती है, क्योंकि कम पानी देखकर लोग नदी के वास्तविक खतरे को नजरअंदाज कर देते हैं। हाल के दिनों में नदी के बीच टापू पर फंसने की घटनाएं भी इस खतरे की गंभीरता को उजागर कर चुकी हैं। ऐसे में छठ घाट घूमने आने वाले लोगों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। नदी का पानी कम होने का मतलब यह कतई नहीं है कि वहां जाना सुरक्षित है।
इन सावधानियों से टाल सकते हैं हादसा
सैलानियों को नदी के बीच बने टापू या चट्टानों तक जाने से बचना चाहिए। बच्चों को पानी के किनारे अकेला न छोड़ें और सेल्फी या रील बनाने के लिए कभी भी तेज बहाव अथवा नदी के बीच खड़े होकर जोखिम न उठाएं। जलस्तर बढ़ने के संकेत मिलते ही तत्काल सुरक्षित स्थान की ओर लौटें। नदी में पानी छोड़ने की जानकारी न होने पर भी उसे सुरक्षित मानकर प्रवेश न करें।
यदि कोई व्यक्ति बीच नदी में फंस जाए तो खुद पानी में उतरकर बचाव करने के बजाय तत्काल डायल 112 पर सूचना दें। प्रशासन और संबंधित विभाग को भी घाट पर चेतावनी बोर्ड लगाने के साथ ही जल विद्युत इकाइयों के संचालन के दौरान पानी छोड़े जाने की सूचना सार्वजनिक करने की व्यवस्था करनी चाहिए। थोड़ी सी सावधानी न केवल एक सैर को यादगार बना सकती है, बल्कि किसी बड़े हादसे को भी टाल सकती है।
ओबरा जल विद्युत परियोजना के अधिशासी अभियंता आरएस जायसवाल ने बताया जल विद्युत परियोजना की इकाइयों से आवश्यकतानुसार विद्युत उत्पादन कराया जाता है। इसका कोई समय निर्धारित नहीं है। साथ ही परियोजना के निर्माण काल से ही उत्पादन शुरू करने से पहले हूटर या सायरन बजाने की व्यवस्था लागू नहीं है।
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