सीतापुर : तंबौर इलाके के काशीपुर गांव के निवासी बबलू हापुड़ में मिठाई की दुकान पर काम करते थे। लॉकडाउन के बाद वह भी फंसे तो जैसे-तैसे घर आ गए। परिवार में माता-पिता के अलावा दो बड़े भाई हैं। मिठाई की दुकान पर काम करने वाले बबलू के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। गांव में अभी उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है। वह कहते हैं कि पेट के खातिर काम तो मनरेगा में भी कर लेंगे। बबलू 27 मई को हापुड़ से वापस आए थे। अभी वह निर्माणाधीन तटबंध में मजदूरी कर रहे हैं। इसी तरह ऐलिया इलाके के गुड्डू भी मेरठ में गाड़ी चलाते थे। वक्त बदला और लॉकडाउन लगा तो नौकरी भी छूट गई। ऐसे में उनके पास भी सिर्फ एक ही चारा था कि गांव वापस लौट आए। हमेशा ड्राइवर वाला ही काम किया। अब मनरेगा में काम करें या फिर कोई दूसरा विकल्प तलाशें। फिलहाल, परिवार का पेट कैसे पालेंगे, यह बड़ा सवाल है।

बता दें कि सीतापुर जनपद में पिछले कुछ दिनों में 50 हजार से अधिक प्रवासी वापस आ चुके हैं। इन प्रवासियों के लिए जिला प्रशासन ने रोजगार के लिए मनरेगा से काम का भी इंतजाम कराया लेकिन, सिर्फ मनरेगा से यह काम नहीं बनने वाला। दरअसल, जिले में आने वाले प्रवासियों की बात करें तो लोग तमाम ट्रेडों में काम करते थे। उनका काम करने का अंदाज भी वैसा ही था। शरीर भी उसी तरह के माहौल में फिट हो चुका था। अब गांव वापस आकर उनके समक्ष रोजगार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने हुनर के साथ समझौता करें। अगर ऐसा न करें तो वह खुद अपने इंतजाम करें। यह भी बड़ा मुश्किल काम है। अगर प्रवासी इतने सक्षम होते तो उन्हें रोजगार की तलाश में दूरस्थ प्रदेशों में आखिर जाना ही क्यों पड़ता।

मुख्यमंत्री की घोषणाओं का सहारा

मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने इन प्रवासियों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के लिए तमाम घोषणाएं की हैं। इन्हें मूर्त रूप देने की कोशिशें चल रहीं हैं। अब यही इनके लिए बड़ी उम्मीद बनेगा।

वर्जन

'कंपनियों में काम करने वाले फावड़ा तो चला नहीं पाएंगे। ऐसे लोगों के लिए तो अन्य विभागों की योजनाएं ही काम आएंगी।'

- सुशील सिंह, डीसी मनरेगा

Posted By: Jagran

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