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सिद्धार्थनगर में संवरेंगे ब्रिटिश काल के 10 सागर, कालानमक धान की बढ़ेगी खुशबू और पैदावार

Published: Fri, 21 Aug 2026 03:45 PM (IST)

सिद्धार्थनगर में ब्रिटिश काल के 10 सागरों का गहरीकरण और नहरों की सफाई की जाएगी, जिससे कालानमक धान की खुशबू ...और पढ़ें

सिल्ट हटने से बढ़ेगी जलधारण क्षमता, नहरों में लौटेगी धार। जागरण

सिल्ट हटने से बढ़ेगी जलधारण क्षमता, नहरों में लौटेगी धार। जागरण

HighLights

  1. 10 ब्रिटिश-कालीन सागरों का गहरीकरण होगा।

  2. कालानमक धान की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ेगा।

  3. 30 हजार किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।

जितेन्द्र पाण्डेय, सिद्धार्थनगर। ब्रिटिश काल में बनाए गए जिले के 10 सागर अब फिर कालानमक की खुशबू और पोषकता बढ़ाने में सहायक बनेंगे। नेपाल सीमा से सटे इस जिले में इन सागरों की कुल जल संग्रहण क्षमता करीब 70 लाख घनमीटर रही है, लेकिन वर्षों से सिल्ट और गाद भरने के कारण वर्तमान क्षमता करीब 45 लाख घनमीटर रह गई है। सागरों के गहरीकरण और नहरों की सफाई से पुरानी सिंचाई व्यवस्था बहाल करने की तैयारी है।

ड्रेनेज विभाग ने मझौली और शिवपति सागर का परीक्षण कराया तो जलधारण क्षमता में आई कमी सामने आई। आठ लाख घनमीटर क्षमता वाले मझौली सागर में अब करीब 5.8 लाख और तीन लाख घनमीटर क्षमता वाले शिवपति सागर में केवल 2.3 लाख घनमीटर पानी संग्रहित हो पा रहा है। वर्ष 1901 में स्थापित इन सागरों से करीब 256 किलोमीटर लंबी नहरें निकली हैं।

मान्यता है कि हिमालय से करीब 40 किलोमीटर दूरी पर होने के कारण पर्वतीय जड़ी-बूटियों का अर्क वर्षाजल के साथ यहां पहुंचता था। सागरों से नहरों के माध्यम से यही पानी खेतों तक पहुंचता था, जो कालानमक धान की विशिष्ट सुगंध और पोषक तत्वों को बढ़ाने में सहायक माना जाता है। समय के साथ सागरों में गाद भरने से जलधारण क्षमता घटी तो नहरों की सिंचाई व्यवस्था भी प्रभावित होती चली गई।

18 हजार हेक्टेयर में खेती, 30 हजार किसान जुड़े
जिले में करीब 18 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में कालानमक की खेती होती है। करीब 30 हजार किसान सीधे तौर पर इससे जुड़े हैं। सागरों की जलधारण क्षमता बढ़ने और नहरों से पुरानी तरह सिंचाई व्यवस्था बहाल होने पर इन किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।

खेतों तक पर्याप्त पानी पहुंचने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार की उम्मीद है। ड्रेनेज विभाग सागरों को गहरा करने और उनसे जुड़ी नहरों की सफाई की योजना तैयार कर रहा है। इससे वर्षाजल का अधिक संग्रह हो सकेगा और जरूरत के समय नहरों के जरिये खेतों तक पानी पहुंचाया जा सकेगा।

लखनऊ से दक्षिण भारत तक पहुंच
सिद्धार्थनगर का कालानमक लखनऊ, दिल्ली से लेकर दक्षिण भारत तक पहुंचता है। उत्पादन और गुणवत्ता बेहतर होने पर बाजार में इसकी मांग बढ़ने की संभावना है। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ जिले की कृषि पहचान को भी मजबूती मिलेगी। कालानमक के बढ़ते आकर्षण से कृषि पर्यटन और स्थानीय उत्पादों के केंद्र के रूप में सिद्धार्थनगर को नई पहचान मिलने की उम्मीद है।

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चार डिजिट का नंबर गेम

  • 10 ब्रिटिश काल के सागर हैं जिले में
  • 256 किमी लंबी नहरें निकली हैं इन सागरों से
  • 18000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में होती है कालानमक की खेती
  • 1901 में स्थापित किए गए थे ये सागर

सागरों की जलधारण क्षमता बढ़ाना प्राथमिकता में है। नहरों की सफाई और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने से कालानमक उत्पादक किसानों को पर्याप्त पानी मिलेगा। इससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार आएगा।

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-शिवशरणप्पा जीएन, जिलाधिकारी।