नवरात्र पर जीवंत हुई पुरानी परंपरा, सिद्धार्थनगर में बढ़ी मिट्टी के कलश व दीयों की मांग; कुम्हारों के चेहरे पर लौटी मुस्कान
शारदीय नवरात्र में मिट्टी के कलश और दीयों की मांग बढ़ने से पुरानी परंपराएं फिर से जीवंत हो रही हैं। ...और पढ़ें
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HighLights
नवरात्र में मिट्टी के कलश-दीयों की मांग बढ़ी।
पुरानी परंपराएं जीवंत हुईं, कुम्हारों को लाभ।
कुम्हार कुन्नू प्रजापति की आय में वृद्धि।
चंदर गिरी, बिस्कोहर। नवरात्र पर्व पर घरों में कलश स्थापना और देवी आराधाना की तैयारियों के साथ मिट्टी के कलश, दीये और पवन पात्र की मांग में तेजी आई है। इस बार डिजाइनदार कलश की तुलना में मिट्टी के कलश की डिमांड ज्यादा है। पुरानी पंरपरा जीवंत हो रही है तो कुम्हारों के दिन भी लौट रहे हैं। नगर पंचायत बिस्कोहर के कुम्हार कुन्नू प्रजापति इस बार काफी खुश है। पिछले एक महीने से मिट्टी के कलश, दीया व दान पात्र बनाने में जुटे हैं। मंद पड़े मिट्टी के काराबोर में इस बार नई उम्मीद जगने से इनके चेहरे पर खुशी लौट आई है।
कुन्नू प्रजापति लंबे समय से मिट्टी के कारोबार से जुड़े हुए हैं। पहले नवरात्र और दीपावली में इनकी बिक्री विशेष होती थी। मगर पिछले कुछ वर्षों से बढ़ते डिजाइनदार कलश व चाइनीज लाइटों ने इनके कारोबार पर असर डाला। इसकी वजह से इनकी आमदनी भी घटती गई। मगर इस वर्ष एक बार फिर से मिट्टी के कलश, दीया व दान पत्र की मांग ने इनके चेहरे पर सुकून बख्श दिया है।
चूंकि नवरात्र में कलश स्थापना के लिए मिट्टी के कलश को सबसे पवित्र माना जाता है। लोग अपनी पुरानी परंपरा पर लौट रहे हैं। इसके चलते शारदीय नवरात्र और दीपावली कुम्हारों के लिए आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में अच्छे संकेत हैं।
कुम्हार कुन्नू ने बताया कि इस बार मांग बढ़ी है। वे मिट्टी लेने के लिए दूसरे गांव अथवा नदी किनारे जाते हैं। मिट्टी लाकर कलश, दीये बनाया जाता है। एक कलश बनाने में पांच मिनट लगता है। लागत करीब 10 रुपये आती है। जबकि बाजार में इसकी बिक्री सौ रुपये की होती है, इसलिए रोजगार भी बेहतर हो जाता है। अभी तक 100 कलश बनाए हैं, इसमें 95 बिक चुके हैं। दीये की बिक्री भी अच्छी हुई है।
विरासत को दे रहे नई पहचान
कुन्नू को ये कारोबार विरासत में मिला। पिता भी इस कारोबार से जुड़े थे। चार वर्ष पहले पिता के देहांत के बाद विरासत को आगे बढ़ाने व नई पहचान में जुटे हुए हैं। त्योहार के अलावा पारंपरिक और मांगलिक मिट्टी के बर्तन भी बनाते हैं। आम दिनों में खपरी, घंटी, कोशिया जैसी सामान से रोजी-रोटी चलाते हैं। कुन्नू का कहना है कि अगर प्रशासन इलेक्ट्रिक चाक व मिट्टी उपलब्ध कराने के लिए एक निश्चित स्थान चिंहित कर दे तो यह पारंपरिक कला आर्थिक तंगी और सांसाधानों की कमी के कारण दम नहीं तोड़ेगी।
