सिद्धार्थनगर : राम कथा प्रत्येक परिवार को रिश्तों का सही अर्थ बताती है। भरत की भक्ति भी ऐसी ही है जिससे समाज को सीख लेने की जरूरत है। उक्त बातें आचार्य बलराम शास्त्री ने सोमवार की रात्रि रामलीला मैदान में कथा के दौरान व्यक्त किया।

कथा व्यास ने कहा कि वनवास के दौरान भगवान राम को निषादराज मिलते हैं। निषादों का राजा भगवान राम का सेवा प्रहरी बनकर अपना जीवन धन्य करते हैं। भगवान राम गंगा नदी को पार कराने के लिए केवट से विनय करते है परंतु केवट उनके चरणों को धोकर गंगा पार कराने को कहता है। राम उसकी बात मान लेते हैं। राम के चरण धोने के बाद केवट गंगा पार कराता है। राम जब उसे उतराई देने लगे तो उसने कहा कि हे प्रभु जैसे मैने आपको नदी पार करवाया उसी तरह आप भी हमें अंतिम समय में भवसागर से पार करा देना, क्योंकि अंतिम समय में तो सिर्फ आपका ही सहारा है। इधर भरत व शत्रुघ्न ननिहाल से अयोध्या लौटे तो राम के वनवास व राजा दशरथ के स्वर्गवास का पता लगने पर दुखी हुए। कैकेई को लज्जित कर भगवान राम से मिलने भरत चित्रकूट धाम पहुंचते हैं। और अयोध्या राम के अयोध्या लौटने का विनय करते हैं। भगवान समझाते हैं कि रघुकुल की रीति है वचन को नहीं तोड़ सकता। राम के समझाने व ऋषि वशिष्ठ के परामर्श पर भरत खड़ाऊ लेकर अयोध्या लौट आते हैं और खड़ाऊ अयोध्या के सिंहासन पर रखकर राज्य संभालने की जिम्मेदारी सत्रुधन को सौंप खुद तपस्या में लीन हो जाते हैं।

Posted By: Jagran

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