सिद्धार्थनगर : तराई की फसलों में अमृत वर्षा का काम करने वाली देश की अनोखी ¨सचाई परियोजना शासन की अनदेखी से दम तोड़ रही है। बदहाल सागर व इससे जुड़ी जमींदारी नहर प्रणाली हर बार चुनावी मुद्दा बनता रहा। वादों की बारिश होती रही, लेकिन यहां के सागर माटी की प्यास नहीं बुझा सके। फाइलों में योजनाएं बनती रहीं, लेकिन धन का सूखा कभी दूर नहीं हुआ। वर्ष 2016 में जब प्रधानमंत्री कृषि ¨सचाई योजना के तहत इनके कायाकल्प की योजना बनी तो एक आस जगी थी। अफसोस कि यह परियोजना भी पिछले दो साल से फाइलों में ही सिसक रही है।

150 वर्ष पहले बर्डपुर क्षेत्र के तत्कालीन अंग्रेज जमींदार मिस्टर बर्ड ने नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रों में जमींदारी नहर प्रणाली नामक परियोजना के तहत श्रमदान के माध्यम से मरथी, मझौली, बजहा, बटुआ, सिसवा, मोती, महली, मसई, सेमरा, मेखड़ा, शिवपति व जानकीनगर नामक एक दर्जन जलाशयों (सागर) का निर्माण कराया था। बरसात में नेपाल से आने वाला करीब 806.8 मिलियन घन फुट पानी इन्हीं जलाशयों में इकट्ठा होता था। इनसे बाढ़ बचाव के साथ ही इस पानी का प्रयोग 242 किमी लंबी 40 नहरों के माध्यम से बर्डपुर क्षेत्र में ¨सचाई के लिए किया जाता था। आजादी के बाद इस प्रणाली के माध्यम से बर्डपुर, नौगढ़ व शोहरतगढ़ ब्लाक के 10 हजार हेक्टेयर खेतों की ¨सचाई की जाती थी। सागरों में निरंतर बढ़ती सिल्ट के चलते उनकी जल संग्रहण क्षमता घटती गई तथा इससे जुड़ी नहरें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। वर्तमान में यह प्रणाली पूरी तरह निष्प्रयोज्य साबित हो रही है। जिसका नतीजा है कि क्षेत्र से कालानमक धान विलुप्त होता जा रहा है। इस प्रणाली के पुनरुद्धार के लिए समय-समय पर कवायद तो हुई, पर योजनाएं परवान न चढ़ सकीं।

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दो दशक पहले से चल रही कवायद

वर्ष 1996 में तत्कालीन ड्रेनेज अभियंता डी.के. दास ने इस प्रणाली पर मंडराते खतरे की ओर इशारा किया था तथा शासन और जिले के सभी तत्कालीन विधायकों को प्रेषित रिपोर्ट में आगाह किया था कि यदि प्रणाली सुधार के लिए तत्काल सात करोड़ रुपये नहीं मिले तो 2005 तक यह ¨सचाई परियोजना समाप्त हो जाएगी, मगर उनकी रिपोर्ट पर शासन अथवा किसी जनप्रतिनिधि ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जिसका परिणाम रहा कि इस प्रणाली ने दम तोड़ दिया।

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बनता रहा चुनावी मुद्दा

सागर, इससे जुड़ी नहरें व कालानमक हर बार चुनावी मुद्दा बनता रहा। वादों के सहारे कितने लोग सड़क से सदन में पहुंच गए, पर किसी ने इसका ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1998 में इसके जीर्णोद्धार के लिए लगभग 11 करोड़ रुपये विभाग को मिले भी, पर उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

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मनरेगा से भी हुआ जीर्णोद्धार का प्रयास

सागरों के जीर्णोद्धार के लिए शासन से धन न मिलने के बाद जिला प्रशासन ने मनरेगा से इनका कायाकल्प कराने की कवायद चार माह पहले शुरू किया था। एक जिला एक उत्पाद में कालानमक के चयन के बाद यह पहल शुरू हुई थी। आशय था कि इनके जीर्णोद्धार से कालानमक को भी संजीवनी मिलेगी। कार्ययोजना भी बनी, पर तकनीकी उलझने एक बार फिर सागरों की राह में रोड़ा साबित हुई। जिला प्रशासन चाह कर भी कुछ न कर सका।

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प्रधानमंत्री कृषि ¨सचाई योजना भी रही नाकाम

जून 2016 में प्रधानमंत्री कृषि ¨सचाई योजना के तहत सागरों के कायाकल्प के लिए 91 करोड़ रुपये व इससे जुड़ी नहरों व अन्य नालों की मरम्मत के लिए 46 करोड़ रुपये का प्रस्ताव शासन को भेजा गया। पांच साल की इस परियोजना का यह तीसरा साल चल रहा है, पर अभी तक एक धेला भी बजट जारी नहीं हुआ है। ड्रेनेज खंड ने इस वित्तीय वर्ष में करीब 16 करोड़ रुपये की डिमांड भी भेजी, लेकिन अभी तक कोई धन जारी नहीं हुआ है।

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यह होता लाभ..

इस परियोजना के पुनर्जीवित होने से क्षेत्र की पहचान कालानमक का स्वाद व खुशबू फिर से लौट आती। इससे शोहरतगढ़ ब्लाक के 10759 हेक्टेयर व बर्डपुर ब्लाक के 11888 हेक्टेयर खेतों को पर्याप्त पानी मिलता। जहां किसानों की ¨सचाई की समस्या दूर हो जाती, वहीं काफी हद तक बाढ़ की त्रासदी से भी निजात मिल जाती।

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प्रधानमंत्री कृषि ¨सचाई योजना के तहत प्रस्ताव बनाकर शासन को जून 2016 में ही भेज दिया गया था। कुछ विभागों में धन भी आ गया है। सागरों की परियोजना ¨सचाई विभाग से संबंधित है। इसके बारे में वही बता सकते हैं।

डा. पीके कन्नौजिया

उपनिदेशक कृषि

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योजना बनने के बाद से अभी तक इस मद में कोई धन प्राप्त नहीं हुआ है। चालू वित्तीय वर्ष में इसके तहत करीब 16 करोड़ रुपये की डिमांड भी भेजी गई है। बावजूद इसके अभी तक कोई धन नहीं मिला है।

एमटी राय

अवर अभियंता-ड्रेनेज खंड

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