मिट्टी की सादगी ने बढ़ाई दीपोत्सव की चमक, श्रावस्ती के बाजारों में मिट्टी के दीयों की बढ़ी मांग
मिट्टी के कलाकार दिन-रात मेहनत कर दीये बनाते हैं, जिससे दीप पर्व पर घरों में रोशनी फैलती है और उनके ...और पढ़ें

HighLights
मिट्टी के कलाकार दिन-रात दीये बनाने में जुटे।
इस बार दीयों और खिलौनों की बिक्री अच्छी रही।
पारंपरिक दीये पर्यावरण मित्रता और सादगी के कारण पसंद।
राहुल सिंह, श्रावस्ती। दीप पर्व प्रकाश और उल्लास का प्रतीक है। इसके पीछे छिपी है, उन मिट्टी के कलाकारों की मेहनत, जो दिन-रात चाक घुमाकर मिट्टी को दीये के रूप में आकार देते हैं। यही छोटे-छोटे दीप जब अमावस की रात में घर-घर जगमगाते हैं, तो मिट्टी के कलाकारों के चेहरे पर भी मुस्कान तैर जाती है।
भिनगा नगर के हनुमानगढ़ी मुहल्ला निवासी गिट्टू व इकौना नगर के अंबेडकर नगर वार्ड निवासी मिट्टी के कलाकार पप्पू बताते हैं कि दीप पर्व से करीब एक माह पहले ही मिट्टी के दीये बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है।
सुबह से देर शाम तक चाक पर मिट्टी को आकार देते हैं, फिर धूप में सुखाकर लकड़ी की आग में पकाने के बाद उन पर सुंदर रंग चढ़ाते हैं। इस बार दीयों और खिलौनों की बिक्री अच्छी हो रही है। इससे उनके परिवार में भी खुशी का माहौल है। इकौना नगर के कबीरनगर वार्ड निवासी मिट्टी कलाकार जवाहिर, कोयले व पप्पू मुस्कुराते हुए कहते हैं कि जब हमारे बनाए दिए किसी के घर की चौखट पर प्रकाश फैलाते हैं, तो लगता है जैसे हमारी मेहनत और परंपरा दोनों उजियारा फैला रही है।
बाजारों में इन दिनों मिट्टी के दीयों की मांग तेजी से बढ़ी है। भले ही इलेक्ट्रिक झालरों और रंगीन लाइटों की भरमार हो, लेकिन पारंपरिक मिट्टी के दीये अपनी सादगी, पर्यावरण मित्रता और सांस्कृतिक पहचान के कारण लोगों की पहली पसंद हैं। इस बार 100 साधारण दीयों की कीमत 80 से 100 रुपये तक है, जबकि बड़ी रंगीन और सजावटी दीये 10 से 100 रुपये तक बिक रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का मानना है कि मिट्टी का दीया केवल रोशनी का माध्यम नहीं, बल्कि शुभता, समृद्धि और परंपरा का प्रतीक है। दीपों की यह रोशनी केवल घरों को नहीं, बल्कि मिट्टी के कलाकारों के चेहरों पर भी मुस्कान बिखेरती है।
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