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बुद्ध की तपोभूमि ही नहीं, थारू जनजाति की पारंपरिक कारीगरी का गढ़ भी है श्रावस्ती, विदेशों में भी है डिमांड

By Sachin sharmaEdited By: Sachin Sharma
Published: Tue, 15 Sep 2026 03:21 PM (IST)

Shravasti Tourism उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले की थारू जनजाति अपनी पारंपरिक आदिवासी शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें ...और पढ़ें

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HighLights

  1. श्रावस्ती की थारू जनजाति की पारंपरिक शिल्प कला है अनूठी पहचान।

  2. मूंज, रड़ा घास, थारू कढ़ाई और मिट्टी-लकड़ी की कला प्रमुख।

  3. ODOP योजना से शिल्प को प्रोत्साहन, कारीगरों की आय में वृद्धि।

सचिन शर्मा, लखनऊ। One District One Product उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक जिले श्रावस्ती की पहचान केवल बौद्ध स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपनी थारू जनजाति की पारंपरिक आदिवासी शिल्प कला के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां का शिल्प जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं, प्रकृति और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

मूंज और रड़ा घास से बनती है खूबसूरत कला

जंगल और तराई क्षेत्रों से प्राप्त स्थानीय घास यानी रड़ा और मूंज का उपयोग करके हर रोज इस्तेमाल होने वाले सामान और विवाह समारोहों के लिए बेहद खूबसूरत वस्तुएं बनाई जाती हैं। इनमें डलिया, मऊनी, सूप और पारंपरिक सजावटी टोकरी 'डेलवा' शामिल हैं। 'डेलवा' का उपयोग शादी-विवाह के दौरान दूल्हे के सामान और उपहारों को ले जाने के लिए खास तौर पर किया जाता है।

क्या है थारू कढ़ाई

थारू जनजाति की महिलाएं कपड़ों पर बेहद बारीक हाथ की सिलाई और रंग-बिरंगे कपड़ों के पैच लगाकर खूबसूरत डिजाइन तैयार करती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'कटौती' कहा जाता है। इसमें पक्षी, फूल और प्राकृतिक आकृतियों का उपयोग होता है।

मिट्टी और लकड़ी की शानदार कलाकारी

Shravasti Handicrafts रोज के इस्तेमाल के लिए बर्तन, सजावटी खिलौने और नक्काशीदार लकड़ी के फर्नीचर भी श्रावस्ती के आदिवासी कारीगरों की निपुणता को दर्शाते हैं। जिनकी यह कला न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी काफी जानी जाती है। आज इन शिल्पों की विदेशी बाजार में भी भारी डिमांड है।

एक जिला एक उत्पाद योजना ने दी पहचान

पारंपरिक रूप से यह शिल्प केवल घरेलू जरूरतों और विवाह के उपहारों तक सीमित था। हालांकि, योगी सरकार की 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' योजना के तहत श्रावस्ती के जनजातीय शिल्प को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे स्थानीय महिलाओं और कारीगरों को प्रशिक्षण, बाजार और आजीविका के नए साधन मिल रहे हैं। स्थानीय कारीगरों की आय में बढ़ोतरी हुई है और उनके काम को नई पहचान मिली है। UP Tourism

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