गंगा संरक्षण के लिए जीवन समर्पित करने वाले प्रो. जीडी अग्रवाल को मरणोपरांत अवार्ड, IIT कानपुर में मिलेगा सम्मान
गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले प्रोफेसर गुरु दास अग्रवाल को वर्ष 2026 के सत्येंद्र के. दुबे मेमोरियल अवार्ड से मरणोपरांत सम्मानित किया जाएगा।

HighLights
प्रो. जीडी अग्रवाल को 2026 सत्येंद्र के. दुबे मेमोरियल अवार्ड मरणोपरांत मिलेगा।
उन्होंने गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए जीवनभर संघर्ष किया।
आईआईटी कानपुर 67वें स्थापना दिवस पर उनके पुत्र को आमंत्रित करेगा।
जागरण संवाददाता, शामली। ऐतिहासिक नगरी कांधला के नाम एक और गौरव जुड़ने जा रहा है। गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले स्व. प्रोफेसर गुरु दास अग्रवाल को वर्ष 2026 के सत्येंद्र के. दुबे मेमोरियल अवार्ड से मरणोपरांत सम्मानित किया जाएगा।
आईआईटी कानपुर की मूल्यांकन समिति ने उनकी जीवनभर की उपलब्धियों और मानवीय मूल्यों के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए यह निर्णय लिया है। दो नवंबर को आईआईटी कानपुर के 67वें स्थापना दिवस पर आयोजित समारोह में उनके पुत्र तरुण अग्रवाल को आमंत्रित किया है। संस्थान ने कहा कि प्रो. अग्रवाल की निस्वार्थ सेवा और मानवीय मूल्यों की विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
प्रो. जीडी अग्रवाल का परिचय
गंगा संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले डॉ. गुरु दास अग्रवाल का जन्म कांधला के प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में 18 जुलाई 1932 को हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कांधला के हिंदू इंटर कॉलेज में हुई। इसके बाद मुजफ्फरनगर से उन्होंने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की और बाद में आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियर की डिग्री ली।
सिविल इंजीनियर से प्रोफेसर तक
डॉ. गुरु दास अग्रवाल ने इसके बाद अमेरिका की कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पर्यावरण विषय में पीएचडी की। कुछ समय तक उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग में सिविल इंजीनियर के रूप में सेवाएं दीं। इसके बाद वह आईआईटी कानपुर में 17 वर्षों तक पर्यावरण के प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। वे रिहंड बांध का डिजाइन बनाने वाली टीम के प्रमुख भी रहे। उनके प्रयास पर सरकार ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन किया जिसका उन्हें प्रथम सदस्य सचिव का दायित्व दिया।
उन्होंने चित्रकूट स्थित नानाजी देशमुख ग्रामोदय विश्वविद्यालय में 20 वर्षों तक पीएचडी शोधार्थियों को अवैतनिक रूप से मार्गदर्शन और शैक्षणिक सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से गंगा संरक्षण को अपना प्रमुख उद्देश्य बना लिया।
111 दिन अनशन, 11 अक्टूबर 2018 को निधन
गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए उन्होंने कई बार अनशन किया। वर्ष 2018 में गंगा संरक्षण की मांग को लेकर किए गए 111 दिन के अनशन के बाद 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया। वहीं, वर्ष 2008 में 17 दिन के अनशन के बाद केंद्र सरकार को भागीरथी नदी के गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित करने और गंगा से जुड़े मुद्दों पर संस्थागत स्तर पर कदम उठाने पड़े।
