अंबुज मिश्र, शाहजहांपुर : किसानों को गन्ने के कैंसर यानी लाल सड़न रोग से जल्द निजात मिलेगी। गन्ना शोध परिषद ने कोयम्बटूर की मशीन की मदद से इसका इलाज शुरू कर दिया है। लाल सड़न रोग (रेड रॉट) से किसानों को हर साल काफी नुकसान होता है। इसकी रोकथाम के लिए अब तक फफूंदीनाशक का स्प्रे किया जाता था, जो कारगर नहीं था। इसलिए परिषद में वैज्ञानिकों ने इस बीमारी से रहित बीज तैयार करने का निर्णय लिया है। जिससे हर साल लाखों किसानों को नुकसान से बचाया जा सकेगा।

इस तरह होता है शोधन

इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे परिषद के वैज्ञानिक डा. सुजीत सिंह ने बताया कि कोयम्बटूर के गन्ना प्रजनन संस्थान से मशीन (सेट ट्रीटमेंट डिवाइस) मंगवाई गई है। वैक्यूम आधारित इस मशीन में गन्ने के एक-एक हाथ के टुकड़े काटकर मशीन में डाले जाते हैं। ऊपर से फफूंदीनाशक डाला जाता है। वैक्यूम से दवा बीज के दोनों सिरों से अंदर पहुंचती है, जिसके बाद शोधित बीज नर्सरी में लगाया जाता है। अब तक स्प्रे के कारण दवा गन्ने के अंदर नहीं जा पाती थी। जिस कारण फफूंदी नहीं मर पाती थी और दोबारा पनपती थी। यह बीमारी न सिर्फ गन्ने को बल्कि आसपास की फसल को भी नुकसान पहुंचाती थी।

सेवरही में भी हो रहा काम

शाहजहांपुर के अलावा परिषद के कुशीनगर स्थित सेवरही सेंटर पर इस मशीन से शोधित बीज की नर्सरी तैयार हो रही है। दो वर्षों में अब तक यह रोग सामने नहीं आया है। आखिरी चरण बाकी है। इसके बाद मशीनों की संख्या बढ़ाई जाएगी। नर्सरियों में तैयार बीमारी रहित बीज अन्य सेंटरों की नर्सरियों में मल्टीप्लाई कर लगाकर पूरे प्रदेश के किसानों तक पहुंचाया जाएगा।

खास-खास

- लाल सड़न रोग से 50 फीसद किसान होते हैं प्रभावित, 90 फीसद तक होगा नुकसान।

- अप्रैल व मई में दिखाता है सबसे ज्यादा असर

- अब तक फफूंदीनाशक स्प्रे करने के साथ पौधे को उखाड़कर ब्लीचिग पाउडर डालते थे।

- लाल सड़न रोग वाले गन्ने को चीनी मिलें भी कर देती हैं अस्वीकृत

- गन्ना गांठों से आसानी से टूट जाता है, पत्तियों की मध्यशिरा पर दिखते हैं लाल धब्बे।

- गन्ने का अगोला धीरे-धीरे सूखने लगता है, गन्ने के अंदर का भाग दिखता है लाल रंग का।

- 10 से 40 वर्ष तक होता है गन्ने की एक वैरायटी का अधिकतम जीवन। लाल सड़न रोग से किसानों का सौ फीसद तक नुकसान देखा है। इसकी रोकथाम के लिए हमने कोयम्बटूर की तकनीक को अपनाया है। इसके लिए बीमारी रहित नर्सरी तैयार कर रहे हैं। वैक्यूम से दवा अंदर पहुंचती है और फफूंदी जड़ से खत्म हो जाती है। नर्सरी में ही शोधित बीज तैयार होगा तो इसका संक्रमण खत्म होगा।

डा. सुजीत सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक गन्ना शोध परिषद ज्यादा पुरानी वैरायटी में प्रतिरोधक क्षमता कम होने से इस रोग का प्रभाव बढ़ जाता है। इस समय 238 की मांग ज्यादा है और उसमें यह रोग भी बढ़ा है। एक मशीन में 30 से 40 किलो बीज शोधित होता है। हमने गत वर्ष विकसित तीन वैरायटी कोशा 13235, कोशा. 10239 व कोसे 13452 के इस बीमारी रहित बीज तैयार करने का भी काम किया है।

डा. जे सिंह, निदेशक गन्ना शोध परिषद

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