शाहजहांपुर में 150 में से 46 राइस मिलों पर ताले: 1980 के रेट पर कुटाई और बकाया भुगतान से संकट में 'चावल का कटोरा'
शाहजहांपुर में पुरानी नीतियों, बकाया भुगतान और परिचालन चुनौतियों के कारण राइस मिल उद्योग संकट में है, जिससे 150 में ...और पढ़ें

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HighLights
एजेंसियों की मनमानी व तंत्र की लापरवाही के कारण राइस मिलर निराश
सिंगल विंडो सिस्टम प्रभावी करने के साथ ही कलस्टर बनाने की मांग
जागरण संवाददाता, शाहजहांपुर। धान का कटोरा, राइस किंग... जैसे कई तमगे शाहजहांपुर को मिले। इसका कारण यहां होने वाली धान की अधिक पैदावार व उससे निकलने वाले चावल की अच्छी गुणवत्ता थी। अनुकूल माहौल में राइस मिल भी खूब पनपीं, जिससे किसानों को प्रोत्साहन व हजारों लोगों के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।
केरल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा बढ़ी मांग ने सरकार के राजस्व में भी खूब वृद्धि की, लेकिन पिछले सात वर्षों में घटते क्षेत्रफल से यह उद्योग लड़खड़ाया तो संभल नहीं पा रहा। एक समय यहां पर 150 राइस मिलें थीं, लेकिन अब 46 पर ताले लग चुके हैं।
जो राइस मिल चल रही हैं उनके संचालक लंबे समय तक इन्हें संचालित करने के इच्छुक नहीं हैं। उनका कहना है कि बकाया भुगतान के साथ ही एजेंसियों की मनमानी पर अंकुश लगे तो चावल की सुगंध और महकेगी।
अजीजगंज निवासी हितेश अग्रवाल के परिवार में जिले की सबसे पहली राइस मिल लगी थी। तराई की बेल्ट में पुवायां, बंडा व खुटार से होने वाली पैदावार ही मोटेे धान की पर्याप्त उपलब्धता करा देती थी।
यही कारण था कि यहां पर कृषि आधारित उद्याेग खूब फला फूला। समय के साथ मशीनरी से लेकर मजदूरी तक बदली, पर इनके लिए जो सरकारी नीतियां बनाई गईं उनमें बदलाव न आया।
आठ वर्ष पहले उन्होंने इसे बंद कर दिया। कारण, पूछने पर बोले कि घाटे में व्यापार अधिक समय तक नहीं कर सकते। इसलिए पारिवारिक व्यवसाय छोड़ दूसरे उद्योग शुरू किए।
जो मिल संचालित कर रहे हैं उनके सामने उन्हें भी शिकायत है, लेकिन सरकार से समाधान की उम्मीद भी है। भुगतान के लिए जिन 15 विभागों के चक्कर लगाने होते हैं, उनमें सरलीकरण हो।
नीतियों में बदलाव की लंबित मांगें पूरी करने के साथ ही धान उत्पादन के लिए अनुकूल इस क्षेत्र में कलस्टर बनाए जाने से खत्म होते उद्योग को संजीवनी मिले।
राइस मिलर्स एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सुधीर अग्रवाल कहते हैं कि बस यूं समझ लीजिए कि राज्य सरकार चाहें तो प्रत्येक समस्या का समाधान कर सकती है, लेकिन अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे।
समय पर भुगतान न होने का मुद्दा हो या 44 वर्ष पूर्व तय की गई दर पर अब भी कुटाई करने की शर्त में बदलाव की मांग शासन स्तर तक कई बार मांग उठी, पर समाधान नहीं हुआ। इसलिए संचालकों ने इस काम से हाथ खींचना शुरू कर दिया है।
केंद्र सरकार भी दे ध्यान
चावल को फोर्टिफाइड करने के लिए इसमें एफआरके विटामिन बी-12 की तरह मिलाया जाता है। जो कुपोषण काे दूर करने के लिए सबसे ज्यादा कारगर है।
इसके लिए केंद्र सरकार राज्य सरकार के माध्यम से चार रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से भुगतान करती है, लेकिन कई मिल संचालकों को दो से तीन साल से रुपया नहीं मिला। मिल संचालकों का औसतन 40 लाख रुपये बकाया है।
रिकवरी का बढ़ाया जाए प्रतिशत
वर्तमान में यहां संचालित 50 राइस मिलों का वार्षिक टर्न ओवर औसतन 100 से 150 करोड़ रुपये तक है। शेष मिलों का टर्नओवर औसतन 30 से 50 करोड़ रुपये के बीच है।
सरकारी खरीद का जो धान दिया जाता है, उसमें 50 से 55 प्रतिशत चावल ही निकलता है। खंडा (टूटा चावल) मिलाने के बाद यह 60 प्रतिशत तक होता है। सरकार 67 प्रतिशत रिकवरी लेती है। मिल संचालक रिकवरी प्रतिशत बढ़ाने की जरूरत बता रहे है।
पुराना भुगतान नहीं हो रहा
केंद्र सरकार से मिलने वाले बजट से ही प्रदेश सरकार एजेंसियों के माध्यम से भुगतान करती है। धान खरीद से लेकर उसकी कुटाई की अवधि में वजन एक प्रतिशत धान सूखकर कम होने का मानक है। इसका भुगतान राइस मिलर को किया जाता है, लेकिन पीसीएफ व एफसीआइ इसका पांच से छह वर्ष पुराना भुगतान भी नहीं कर रहीं।
बढ़े टूटन का मानक
कुटाई के दाैरान चावल टूटने का मानक 25 प्रतिशत निर्धारित है। इससे अधिक टूटन होने पर राइस मिलर को भरपाई करनी होती है। राइस मिलरों की मांग है कि टूटन को 30 प्रतिशत किया जाए। क्योंकि धान की गुणवत्ता बेहतर नहीं है।
कुटाई 1980 से 10 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है अब भी वही चल रही है। समय से तैयार चावल एफसीआइ के गोदाम तक पहुंचाने पर दी जाने वाली 30 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि भी नहीं पाती।
सिंगल विंडो सिस्टम करें प्रभावी
राइस मिल के संचालन में उद्योग, प्रदूषण, खाद्य सुरक्षा, प्रसंस्करण विभाग, जीएसटी, बाट माप सहित लगभग 15 विभागों की प्रक्रिया से गुजरना होता है। राइस मिलर चाहते हैं कि उनके लिए सिंंगल विंंडो सिस्टम किया जाए।
कलस्टर बनाया जाए तो चावल की पैकिंग से लेकर गुणवत्ता तक में सुधार होगा।विभागों का अनावश्यक हस्तपेक्ष समाप्त होगा। एक ही स्थान पर सभी औपचारिकताएं पूरी की जा सकेंगी।
राइस मिलें ही बंद होने लगेंगी तो धान की खेती के प्रति किसान भी हतोत्साहित होंगे। सरकारी तंत्र की उदासीनता तो खत्म करना होगा। सरकार को राइस मिलरों की ओर ध्यान देना चाहिए। - रामचंद्र सिंघल, राइस मिलर
पूरे प्रदेश में राइस मिल उद्योग कम हो रहा है। समस्याओं की यूं ही अनदेखी और अधिकारियों की मनमानी जारी रही तो मिलों का संचालन आसान नहीं होगा। - हरिकिशोर गुप्ता, राइस मिलर
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