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मुलायम के रिकॉर्ड वाले गढ़ में बाढ़ पर सियासत: 2027 से पहले गुन्नौर की 'सियासी नाव' किसका बेड़ा पार लगाएगी?

Published: Sun, 13 Sep 2026 03:05 AM (IST)

बाढ़ प्रभावित गुन्नौर विधानसभा क्षेत्र में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है, जहाँ नेता राहत ...और पढ़ें

बाढ़ प्रभावित गांव में नाव से पहुंचे विधायक रामखिलाड़ी यादव और पूर्व मंत्री अजीत यादव जागरण आकाईव

बाढ़ प्रभावित गांव में नाव से पहुंचे विधायक रामखिलाड़ी यादव और पूर्व मंत्री अजीत यादव जागरण आकाईव

HighLights

  1. विधानसभा की चुनावी आहट के बीच बाढ़ प्रभावित गांवों में बढ़ी सियासी सक्रियता

सौरव प्रजापति, संभल। बाढ़ का पानी गांवों को घेर चुका है। खेत जलमग्न हैं, रास्ते डूबे हैं और ग्रामीण राहत की आस में हैं। इन दुश्वारियों के बीच सियासत ने भी अपनी राह तलाश ली है। 3.40 लाख मतदाताओं वाली गुन्नौर विधानसभा क्षेत्र के बाढ़ प्रभावित गांवों में इन दिनों नेताओं की नाव पहुंच रही है।

कोई ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी पीड़ा सुन रहा है तो कोई मदद और राहत का भरोसा दे रहा है। हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच बाढ़ में उतरती इस सियासत के मायने भी तलाशे जा रहे हैं।

बाढ़ प्रभावित गांवों में पहले सपा विधायक रामखिलाड़ी यादव नाव के जरिये पहुंचे। उन्होंने बाढ़ के पानी से घिरे ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याएं सुनीं। फिर भाजपा के पूर्व मंत्री अजीत यादव भी नाव के सहारे बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंचे।

उन्होंने ग्रामीणों से संवाद कर उनकी समस्याओं को जाना। दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के नेताओं का एक के बाद एक बाढ़ग्रस्त गांवों में पहुंचना महज संयोग है या फिर आने वाले चुनाव की जमीन तैयार करने की कवायद, यह चर्चा ग्रामीणों के बीच भी है।

गुन्नौर विधानसभा समाजवादी राजनीति का मजबूत किला है। यहां यादव मतदाताओं की बड़ी संख्या है और सपा का पुराना प्रभाव रहा है। भाजपा भी इस सियासी किले में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। यहां का राजनीतिक इतिहास भी इसे खास बनाता है।

समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव 2004 में गुन्नौर से विधायक चुने गए थे। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा की सदस्यता हासिल करने के लिए उन्होंने गुन्नौर का उपचुनाव लड़ा था।

इसमें उन्हें 90 प्रतिशत से अधिक मत मिले और जीत का अंतर करीब 1.84 लाख वोट रहा, जो अब भी रिकॉर्ड है। हालांकि 2017 में भाजपा ने यहां कमल खिलाकर सपा के गढ़ में सेंध लगाई थी, लेकिन 2022 में सपा ने फिर सीट पर कब्जा कर लिया।

ऐसे में 2027 की लड़ाई को लेकर दोनों दलों की नजर गुन्नौर के गांवों पर है। इस विधानसभा में बाढ़ इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है। ऐसे में नेताओं के नाव से गांवों तक पहुंचने को ग्रामीणों की पीड़ा से जुड़ाव के साथ-साथ चुनावी संपर्क बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

अब सवाल यही है कि बाढ़ के पानी में उतरी नेताओं की यह सियासी नाव कितनी दूर तक जाती है। क्या यह ग्रामीणों के दर्द तक पहुंचेगी या फिर 2027 की चुनावी नैया पार करने का रास्ता भी बनाएगी? इसका फैसला पानी उतरने के बाद नहीं, बल्कि वोटों की धारा में होगा।

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