सहारनपुर : मोहर्रम का चांद दिखने के साथ ही साल हिजरी 1440 शुरू हो गया है। मोहर्रम की एक तारीख यानी 12 सितंबर के लिए इमाम बारगाहों में तैयारी पूरी कर ली गई है। मातमी अंजुमनों ने जुलूसे अलम निकालकर मोहर्रम का आगाज किया। मजलिसों का सिलसिला भी शुरू हो गया है।

मोहर्रम का चांद दिखते ही शिया समुदाय ने इमाम हुसैन व करबला के 72 शहीदों की याद में इमाम बारगाहों में अलम व ताजिये सजाए। सोगवारों की इमाम बारगाहों में आवाजाही शुरू हो गई तथा अंजुमनें मातमी जत्थों के साथ नौहा खानी व सीना•ानी करती हुई अलम के साथ इमाम बारगाहों में पहुंचीं। अंजुमने इमामिया ने अलम का जुलूस बड़तला अंसारियान से निकाला। दूसरा अलम अंजुमने अकबरिया मोहल्ला ख्वाजा •ादगान से निकालकर इमाम बारगाह अंसारियान पहुचे। बच्चों की अंजुमन ए असगरिया ने भी मातमी जुलूस के साथ अलम निकाला। नौहा खानी व मातम करते हुए इमाम बारगाह पहुंचे।

उधर, मोहर्रम की चांद रात में इमाम बारगाह सामानियान में मजलिस का आयोजन मरसियाखानी की गई। इसमें ख्वाजा हसन मोहम्मद, आसिफ अल्वी, इफ्तेखार रि•ावी आदि शामिल रहे। मुरादाबाद के मौलाना फतेह मोहम्मद जैदी ने मजलिस को खिताब फरमाते हुए कहा, मोहर्रम का चांद न•ार आते ही करबला का वह मं•ार हमारे सामने आ जाता है। आज •ारूरत ह•ारत इमाम हुसैन के बताए रास्ते पर चलने की है। इनसेट

इमाम हुसैन की शहादत याद दिलाता है मोहर्रम का महीना

एडवोकेट मंजर हुसैन काजमी ने बताया कि मोहर्रम का महीना ह•ारत इमाम हुसैन की शहादत की याद दिलाता है। इमाम हुसैन अलेहिस्सलाम रसूले खुदा के नवासे थे, जिन्होंने 1379 साल पहले सन 61 हिजरी के मोहर्रम महीने मे करबला के मैदान मे अपने छह माह के अपने बच्चे, 90 साल के बूढ़ों के साथ खुद भी शहादत दी। मोहर्रम का महीना इस्लामिक कलेंडर के अनुसार पहला महीना है। शिया समुदाय के लोग मोहर्रम में इमाम हुसैन का पैगाम दुनियां को सोग मनाकर देते हैं। मजलिसों व जुलूस के जरिये इमाम हुसैन का पैग़ाम लोगों तक पहुंचाने एवं उनके बताए रास्ते पर चलने की हिदायत के साथ भाईचारा कायम रखने की शिक्षा दी जाती है।

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