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मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई की प्रमुख आवाज बनीं फरहा फैज

By Sanjeev Kumar Gupta Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 08 Nov 2026 05:00 AM (IST)

सहारनपुर की अधिवक्ता फरहा फैज तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़कर मुस्लिम महिलाओं के ...और पढ़ें

अधिवक्ता फरहा फैज। जागरण

अधिवक्ता फरहा फैज। जागरण

HighLights

  1. फरहा फैज ने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी।

  2. वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की प्रमुख पैरोकार बनकर उभरीं।

  3. सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई।

जागरण संवाददाता, सहारनपुर : तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने वाली सहारनपुर की अधिवक्ता फरहा फैज मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की प्रमुख पैरोकार बनकर उभरी हैं। महिलाओं के कानूनी अधिकारों से लेकर सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार तक वे बार-बार सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं।

धमकियों और हमले के बावजूद उनका संघर्ष थमा नहीं है। फरहा फैज का कहना है कि उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं को करीब से देखा और महसूस किया। शरीयत के नाम पर महिलाओं को गुमराह कर उनके अधिकारों का हनन किया जाता है। यही अनुभव उन्हें अदालत तक लेकर गया।

2016 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल ला के कोडिफिकेशन और तीन तलाक, बहुविवाह जैसी प्रथाओं के खिलाफ हस्तक्षेप याचिका दायर की। उनका तर्क था कि तलाक-ए-बिद्दत कुरान में मान्य तलाक की प्रक्रिया नहीं है और इससे मुस्लिम महिलाओं को सम्मानजनक जीवन का अधिकार छीना जाता है।

22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया। फरहा फैज इस मामले की याचिकाकर्ताओं में शामिल थीं। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड केवल एक पंजीकृत संस्था है और उसे मुसलमानों के लिए शरिया कानून तय करने का अधिकार नहीं है।

तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाने के बाद फरहा फैज कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गईं। 2016 में ट्रेन में उन पर जानलेवा हमला हुआ। इसके बाद भी वे पीछे नहीं हटीं और महिला अधिकारों के पक्ष में अपनी आवाज जारी रखी। फरहा का मानना है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से महिलाओं को वैवाहिक अधिकारों और उत्पीड़न से अधिक सुरक्षा मिल सकती है। वे मुस्लिम महिलाओं को फतवों के नाम पर अदालतों से दूर रखने की कोशिशों का भी विरोध करती हैं। फरहा का कहना है कि यह लड़ाई केवल उनकी नहीं बल्कि उन लाखों महिलाओं की है, जो चुपचाप अन्याय सहती हैं।

एनजीओ से जुड़कर शुरू की समाजसेवा
22 नवंबर 1972 को सहारनपुर में एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम राजपूत परिवार में जन्मी फरहा फैज के पिता हाफिज फैज मोहम्मद धार्मिक विद्वान थे। बीएससी, बीएड और बीटीसी की शिक्षा के बाद उन्होंने समाज में व्याप्त रूढ़िवाद और महिला उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने का रास्ता चुना। 1997 में एनजीओ महिला एवं बाल विकास समिति से जुड़कर उन्होंने झुग्गी-झोपड़ियों में महिलाओं और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार के लिए काम शुरू किया। 2003 में उन्होंने हिंदू युवक विनोद वर्मा से विवाह किया। पति के 2022 में निधन के बाद भी फरहा ने अपनी सामाजिक और कानूनी मुहिम जारी रखी।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज
महिला अधिकारों के अलावा फरहा फैज ने सहारनपुर में प्रधानमंत्री आवास योजना में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठाया। आरोप था कि मकान आवंटन के बदले लाभार्थियों से कट मनी ली गई। उन्होंने लगभग 500 लोगों की सूची जिला प्रशासन को सौंपकर जांच की मांग की। कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जांच के बाद कथित तौर पर पांच कर्मचारियों को दोषी पाया गया, जिन्हें निलंबित कर उनके खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट दर्ज कराई गई।

 

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