सहारनपुर, जेएनएन: काम जब जुनून बन जाए तो नतीजे सकारात्मक दिखने लगते हैं। वनस्पति विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. एसके उपाध्याय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। शिक्षण के दौरान इस विषय को ऐसे जिया कि जिदगी ही बना लिया। सेवानिवृत्ति के बाद भी यह जुनून बरकरार रहा। अपने शौक को परवान चढ़ाने के लिए उन्होंने कंपनी गार्डन में दुर्लभ औषधीय पौधे लगवाए। शाकंभरी वन क्षेत्र में औषधीय वन बनवाया। यहां वह इन पौधों की देखभाल खुद करते हैं। मशरूम उत्पादन को लेकर उनकी सीख रंग लाई तो हजारों लोगों को रोजगार मिल गया। उन्होंने जेट्रोफा के बीजों से बायो डीजल बनाने की प्रक्रिया भी शुरू कराई। बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन होने से किसानों व युवाओं को रोजगार मिलने लगा है। प्लास्टिक थैलों पर प्रतिबंध की उनकी मुहिम भी सराहनीय रही।

डा. उपाध्याय का बचपन से प्रकृति से जुड़ाव रहा। अध्यापन के साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य भी किए। कंपनी बाग में सैकड़ों पेड़ों का नामकरण किया। पैरामियन पीरियड के विलुप्त हो चुके पौधे जिगो बाइलोबा के सैकड़ों पौधे लगाए। ये पौधे आइटीसी व इंडियन ह‌र्ब्स कंपनी सहित देहरादून व अन्य शहरों में भी बांटे गए।

कंपनी बाग में औषधीय पौधे, रोज गार्डन, जापानी गार्डन व जिगो वन उन्हीं की देन है। डा. उपाध्याय औषधीय पौधों के महत्व तथा इसके व्यावसायिक लाभ बताकर लोगों को इन्हें रोपने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

पांवधोई को पुनर्जीवित करने की पहल

नाले में तब्दील हो चुकी पांवधोई नदी को पुनर्जीवित करने के लिए डा. उपाध्याय ने तत्कालीन डीएम अलोक कुमार को प्रस्ताव दिया था। इस पर पांवधोई बचाव समिति गठित की गई, जो नदी के पुनरुद्धार में जुटी है। इसके लिए श्रमदान रैलियों व गोष्ठियों के जरिए लोगों को जागरूक किया गया। उन्हीं के अथक प्रयास से पांवधोई का वास्तविक स्वरूप वापस हो सका।

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