रामपुर : धान की फसल काटने के बाद किसान खेत खाली करने के लिए खेतों में मौजूद पराली को जलाना शुरू कर देते हैं। पराली जलाने के कारण होने वाला प्रदूषण बहुत घातक सिद्ध होने लगा है। इसका दुष्प्रभाव इस कदर तक खतरनाक है कि वैज्ञानिक भी इसको लेकर परेशान हो उठे हैं। उन्होंने आगाह किया है कि समय रहते इस समस्या से निपटने के उपाय न किए गए तो पर्यावरण, स्वास्थ्य और जमीन की उर्वरता पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है। इसको लेकर कई विकल्प भी तैयार कर लिए गए हैं, जो इस समस्या से निपटने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण से लोगों की सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए कई उपाय अपनाए जा रहे हैं। पराली जलाने से केवल मानव स्वास्थ्य पर ही बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि खेत की सेहत के लिए भी घातक होता है। पराली के धुंए से वायु प्रदूषण बढ़ जाता है और लोगों को सांस लेने में दिक्कत पैदा करता है। इस दिशा में किसानों के लिए अच्छी खबर है। कृषि वैज्ञानिकों ने उनके लिए हैप्पी सीडर नाम की मशीन तैयार की है। इसके प्रयोग से पराली जलाने की जरूरत नहीं रहेगी, बल्कि पराली से खाद तैयार होगी। इसके अतिरिक्त खेती में लागत भी कम होगी। विभाग की ओर से इसको लेकर प्रयास प्रारंभ कर दिए गए हैं। मेले व गोष्ठी लगाकर किसानों को जागरूक किया जा रहा है। उन्हें इसका प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र धमोरा के फसल वैज्ञानिक अमरजीत ङ्क्षसह राठी का कहना है कि जिले में इस साल छह सौ हैक्टेयर भूमि में इस तकनीक का प्रयोग किया गया है। यहां फिलहाल 75 किसान इसका प्रयोग कर रहे हैं और काफी खर्च भी बचा रहे हैं। वह बताते हैं कि पराली जलाने से जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता है, जो मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है। वहीं खेतों की मिट्टी में केंचुआ समेत कई तरह के जीव-जंतु रहते हैं, जो मिट्टी की उर्वर क्षमता और गुणवत्ता को लगातार बढ़ाते हैं, लेकिन खेत में पराली जलाने की गर्मी से वे मर जाते हैं। ऐसे में मिट्टी की उर्वर क्षमता लगातार गिरती रहती है। इसलिए अगर मिट्टी की क्षमता को बनाए रखना है, तो पराली जलाना बंद कर देना चाहिए। किसान अब धान की पराली न जलाएं इसके लिए हैप्पी सीडर के रूप में विकल्प आ चुका है। 

पराली न जलाएं, हैप्पी सीडर का करें प्रयोग

श्री राठी कहते है कि यह वह मशीन है जो पूरे पराल में ही गेहूं की बुवाई कर देती है, जिससे किसानों की उपज भी बढ़ती है और खर्च भी कम आता है। नुकसानदेह खरपतवार भी फसल को नहीं लग पाते। ज्यादा गर्मी पडऩे पर खेत का तापमान भी कम रहता है। जिससे फसल की पैदावार बढ़ती है। यह मशीन पराली के छोटे-छोटे टुकड़े कर खेत में बिछाने के साथ ही उर्वरक डालने तथा बीज बोने का काम भी करती जाती है। ङ्क्षसचाई के बाद पुआल नमी को सूखने से रोकता है। खेत में नमी अधिक समय तक रहने से ङ्क्षसचाई कम लगती है। कीड़े मकोड़ों का प्रकोप भी नहीं हो पाता। समय बीतने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरकता भी बढ़ती जाती है। 

खर्च में होती है बचत

वैज्ञानिक अमरजीत ङ्क्षसह राठी के अनुसार हैप्पी सीडर से गेहूं की बुवाई करने पर तीन लीटर डीजल प्रति एकड़ खर्च होता है। जबकि पराली जला कर गेंहू की बुवाई की जाए तो 20 लीटर डीजल प्रयोग होता है। हैप्पी सीडर से गेंहू की बुआई से लागत खर्च में काफी कटौती होती है। इस प्रकार से गेहूं बोने से कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों की जरूरत भी कम पड़ती है, जिससे फसल पर खर्च कम आता है। 

ङ्क्षसचाई की बचत

सीधी बुवाई से धान में 30 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। जबकि गेहूं की फसल में एक ङ्क्षसचाई की बचत होती है। इस मशीन के उपयोग से किसानों की परंपरागत कृषि पद्धतियों की अपेक्षा लगभग तीन से पांच प्रतिशत अधिक अनाज की उपज होती है। इस तकनीक में जहां एक ओर खेत तैयार करने में लगे समय, धन और ईंधन की बचत होती है तो वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण हितैषी भी है। आलू या मटर की खेती के लिए भी इस तकनीक के साथ-साथ उल्टे हल चलाकर अवशेष को जलाए बिना ही बढिय़ा हल निकाला जा सकता है। 

Posted By: Narendra Kumar

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