रामपुर: श्री जितेन्द्र चंद्र भारतीय महायोग शोध संस्थान में नवरात्र पर हुए कार्यक्रम में आचार्य राधे श्याम शर्मा वासन्तेय ने कहा कि नवरात्र का पूजन मानव की चेतना को शुद्धता और पवित्रता के रस से सराबोर कर देता है। सही निर्णय करने की शक्ति विकसित होती है।

इन दिनों किए जाने वाले विधान में सबसे पहले मन की अशुद्धियों को दूर करने के लिए देवी का आहवान करते है। इस प्रकार पहला कदम काम, लालच, द्वेष, छल की भावना को हटाना है। एक बार जब इन नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति हो जाती है तो अगला कदम सकारात्मक प्रवृत्तियों को आत्मसात कर अपने आप को बलशाली बनाना होता है। आध्यात्मक की राह पर चलकर यह गुण स्वत: ही आने लगते हैं। देवी की साधना आत्मबल बढ़ाती है। उत्कृष्ट मूल्यों व गुणों को विकसित करने के लिए ही देवी का आहवान किया जाता है। नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्याग करके सभी आत्म के सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हेतु मां का आहवान करते है। नवरात्र काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमें सूक्ष्म उर्जा भरी होती है और सूक्ष्म उर्जा का संवर्धन होता है। देवी कृपा से हम गुणातीत होकर सर्वोच्च, अविभाज्य, अ²श्य, निर्मल, अनंत चेतना की प्राप्ति करते हैं। कहा कि हमारी चेतना में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीन तत्व होते है। नवरात्र के पहले तीन दिन तमोगुण, मध्य के तीन दिन रजोगुणी और आखिर के तीन दिन सतोगुणीप्रकृति की आराधना की जाती है। इस प्रकार नवरात्र प्रकृति के साथ इस चेतना का उत्सव भी है। नवरात्र के काल में हम तीनों गुणों से परे त्रिगुणातीत अवस्था में जाते है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर आदि राक्षसी प्रवृत्ति का नाश होता है। रोजमर्रा के जीवन में जो हमारा मन फंसा रहता है, नवरात्र की आराधना उससे हमारे मन को हटाकर आदर्श जीवन बनाने व निखारने का अवसर प्रदान करता है। सांसारिक माया से मुक्त होकर नौ दिनों तक शरीर और मन की शुद्धि की जाती है। इस तरह नवरात्र शुद्धिकरण करने व पवित्र होने का भी पर्व है। इसलिए नवरात्र पूजन का मुख्य प्रायोजन आत्मशुद्धि है। किसी भी प्रकार के आडम्बर से बचना चाहिए। स्वयं को सुधारना ही सबसे बड़ी देवी पूजा है। इस अवसर पर तमाम भक्त उपस्थित रहे।

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