रामपुर में ओवैसी की दस्तक से बदलेगा सियासी समीकरण, मुस्लिम मतदाताओं के बीच पकड़ बनाने पहुंचे AIMIM सांसद
ओवैसी की स्वार-टांडा जनसभा ने रामपुर में नए सियासी समीकरणों की चर्चा छेड़ दी है, जहां AIMIM मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।

टांडा में मंच पर सभा को संबोधित करते सांसद असदुद्दीन ओवैसी।
HighLights
ओवैसी की जनसभा से रामपुर में नए सियासी समीकरण।
AIMIM मुस्लिम मतदाताओं के बीच पकड़ बनाने की कोशिश।
सपा की चुनौतियों के बीच वोटों का बंटवारा संभव।
जागरण संवाददाता, रामपुर। स्वार-टांडा विधानसभा क्षेत्र में आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की जनसभा ने नए सियासी समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। करीब 3.10 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।
ऐसे में ओवैसी की सक्रियता को केवल एक जनसभा के तौर पर नहीं, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक पकड़ बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इसका असर स्वार-टांडा तक सीमित रहने के बजाय रामपुर जिले की अन्य विधानसभा सीटों पर भी पड़ सकता है।
स्वार-टांडा का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। वर्ष 2002, 2007 और 2012 में नवाब परिवार के नवाब काजिम अली खां उर्फ नवेद मियां इस सीट से विधायक चुने गए। वर्ष 2017 में सपा नेता आजम खां ने अपने बेटे अब्दुल्ला आजम को मैदान में उतारा।
अब्दुल्ला ने जीत दर्ज कर सबसे कम उम्र के विधायक बनने का रिकॉर्ड बनाया, लेकिन उम्र संबंधी विवाद में हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनकी सदस्यता मार्च 2019 में समाप्त हो गई।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में अब्दुल्ला आजम फिर विधायक बने, लेकिन मुरादाबाद के न्यायालय से 15 साल पुराने एक प्रकरण में सजा के बाद उनकी सदस्यता चली गई थी।
इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा के सहयोगी अपना दल (एस) के शफीक अहमद अंसारी ने जीत दर्ज की। इस घटनाक्रम ने सीट पर सपा के राजनीतिक प्रभाव और उसके परंपरागत मतदाता आधार को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं।
अब आजम खां और अब्दुल्ला आजम के चुनावी मैदान से बाहर रहने की स्थिति में सपा के सामने नेतृत्व और उम्मीदवार चयन की चुनौती है। पार्टी के भीतर कथित खींचतान और स्थानीय स्तर पर असंतोष की चर्चाओं के बीच ओवैसी की एंट्री मुस्लिम मतदाताओं के सामने एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच खड़ा कर सकती है।
हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि एआईएमआईएम संगठन कितना मजबूत करती है और स्थानीय स्तर पर किस चेहरे को आगे बढ़ाती है।
ओवैसी की रणनीति सफल रहती है तो मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा सपा से अलग होकर एआईएमआईएम की ओर जा सकता है। इसका सीधा लाभ भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मिल सकता है, क्योंकि विपक्षी मतों का बंटवारा चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। वहीं, यदि मुस्लिम मतदाता किसी एक मजबूत उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट रहते हैं, तो ओवैसी की मौजूदगी का असर सीमित भी रह सकता है।
स्वार-टांडा में ओवैसी की जनसभा में उमड़ी भीड़ ने इतना संकेत जरूर दिया है कि रामपुर की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं के प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की लड़ाई नए सिरे से आकार ले सकती है। आने वाले चुनाव में सवाल केवल यह नहीं होगा कि कौन जीतता है, बल्कि यह भी होगा कि मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा किस दल और नेतृत्व के साथ बना रहता है।
