रायबरेली : केवट ने भगवान के चरण ही नहीं धोए, बल्कि अपने कुटुंब (कुल खानदान-परिवार) को तार लिया। प्रेम के वशीभूत परमात्मा उसकी हर बात मानते गए। केवट वहां याचक नहीं, निष्छल-निष्कपट भक्त की तरह नजर आया। जिसे लक्ष्मण के तरकश के तीरों से भी तनिक भय नहीं लगा। ऐसे ही समर्पण वालों की हर पुकार पर दयानिधान दौड़े चले आते हैं। भगवान और भक्त के बीच स्नेह की डोर कितनी सहज, सरल और अटूट होती है, इसकी मीमांशा प्रख्यात रामकथा वाचक शांतनु महराज ने सोमवार को छठवें सोपान पर कही।

रीफार्म क्लब में उन्होंने कथा के प्रारंभ में रघुवंश की माताओं का चरित्र सुनाया। मां कौशल्या, सुमित्रा, जानकी और उर्मिला के चरित्र को आदर्श बताया। कहा कि यह देश, धर्म, संस्कृति यदि सुरक्षित हैं तो इन्हीं माताओं और बहनों के कारण। जिन्होंने अपने पुत्र, भाई और बेटों को तिलक लगाकर धर्म की रक्षा के लिए भेज दिया। जब भगवान राम, मां जानकी और लक्ष्मण के साथ वनवास को निकले तो पूरी अयोध्या मां कैकेई को धिक्कार देते हुए साथ चल पड़ी। यही तो अयोध्यावासियों का भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण है। फिर केवट प्रसंग में महाराज ने कहा कि यदि परमात्मा से मिलन करना हो, एकदम सरल, सहज और भोले हो जाइए। भोले भक्ति को परमात्मा बहुत पसंद करता है। केवट भगवान से चरण धुलवा कर पार उतारने की बात करता है। यही तो भक्त और भगवान के बीच का संबंध है। केवट की नाव से भगवान ने गंगा पार की और उसे उतराई देना चाहा। लेकिन उसने मना कर दिया। जो भगवान से कभी कुछ नहीं लेता, भगवान उसके ऋणी हो जाते हैं। इस मौके पर हरि बोरिकर, पूर्व विधायक गजाधर सिंह, पूर्व विधायक राजाराम त्यागी, पूर्व विधायक राजा राकेश प्रताप सिंह, दिनेश सिंह, दिलीप सिंह, देवेंद्र सिंह, मानवेंद्र प्रताप सिंह, अखंड प्रताप सिंह, शिवम सिंह, शिवेंद्र सिंह, देवऋषि तलरेजा, रणविजय सिंह, ऋषिराज वर्मा आदि मौजूद रहे। 'सीएए, सीएबी का विरोध नहीं, सम्मिलित प्रतिक्रिया है'

धरती हमारी माता है। हम सब इसकी संतान हैं। जब तक इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक देश में वर्तमान वाले दृश्य दिखायी देते रहेंगे। जो भी हो रहा है ये सीएए, सीएबी का विरोध नहीं है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370, राम जन्मभूमि मसला जो इनको पचा नहीं था लेकिन, विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। अब वे लोग एनआरसी के बहाने सड़क पर उतर आए हैं। यह तो उन चार बातों की ही सम्मिलित प्रतिक्रिया है। वे उपद्रवी तत्व हैं जो अशांति फैला रहे हैं। नागरिकता लेना देना अलग-अलग विषय है। किसी भी व्यक्ति की पहचान तो होनी ही चाहिए। देश में ऐसे लोगों की भी बहुलता है जो यथार्थ को छिपाए रहते हैं। पंथ, जाति, मजहब से ऊपर है देश। जिसको मजबूत करने के लिए सांस्कृतिक इकाई को स्वीकार करना होगा। यह बातें शांतनु महराज ने मीडिया से मुखातिब होकर वर्तमान परिदृश्य पर कहीं।

Posted By: Jagran

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