शस्त्र लाइसेंस नामांतरण के लिए सभी कानूनी वारिसों की अनापत्ति अनिवार्य, नहीं मिलेगी कोई ढील: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने शस्त्र लाइसेंस के नामांतरण के लिए सभी कानूनी वारिसों की अनापत्ति अनिवार्य की है, जिसमें कोई ढील नहीं दी जा सकती।
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HighLights
शस्त्र लाइसेंस नामांतरण को सभी कानूनी वारिसों की एनओसी अनिवार्य।
आयुष्मान योजना में अधिक शुल्क लेने वाले अस्पताल का पैनल रद्द।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक लाख फैसलों का हिंदी अनुवाद किया।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। हाई कोर्ट ने कहा कि मृतक के शस्त्र लाइसेंस के नामांतरण के लिए बाकी सभी कानूनी वारिसों की अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) अनिवार्य है। इसमें कोई ढील नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने मीरजापुर के मंगल उर्फ मंगलेश्वर की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।
याची के बड़े भाई के नाम शस्त्र लाइसेंस था। भाई के निधन के बाद याची ने शस्त्र नियम 2016 के नियम 25 के तहत लाइसेंस अपने नाम ट्रांसफर करने के लिए आवेदन किया। मृतक की पत्नी से एनओसी न मिलने के कारण जिला प्रशासन ने आवेदन निरस्त कर दिया। अपील भी खारिज हो गई तो याची हाई कोर्ट पहुंचा। याची के वकील ने दलील दी कि मृतक की पत्नी ने पति की मौत के बाद दूसरा विवाह कर लिया है। इसी वजह से वह एनओसी या शपथ-पत्र देने से मना कर रही है।
ऐसे में मानवीय आधार पर शर्त में छूट दी जाए। सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने विरोध करते हुए कहा कि नियम 25(2)(आइ) के तहत अन्य वारिसों की एनओसी अनिवार्य है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि भाभी ने पुनर्विवाह कर लिया है, कानून में तय शर्त को कमजोर नहीं किया जा सकता, क्योंकि नियम में ऐसी कोई छूट का प्रविधान ही नहीं है। जब शर्त पूरी नहीं हुई तो लाइसेंस ट्रांसफर नहीं हो सकता।
कैंसर पीड़ित मासूम को खून चढ़ाने के लिए नौ हजार वसूलने वाले अस्पताल को राहत नहीं
ब्लड कैंसर पीड़ित दो माह के बच्चे को खून चढ़ाने के लिए नौ हजार रुपये वसूलने वाले मुरादाबाद के सुरगिमेद अस्पताल को इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने आयुष्मान भारत योजना के पैनल से पंजीकरण रद करने संबंधी फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने सुरगिमेद अस्पताल की याचिका पर दिया है।
अस्पताल ने राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (साचिस) के तहत पैनल से हटाने के 19 अगस्त 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। अस्पताल को 18 जून 2026 को कारण बताओ नोटिस दिया गया था। जांच में सामने आया कि बच्चे को खून की दो यूनिट चढ़ाई गई और नौ हजार रुपये ले लिए गए, जबकि आयुष्मान योजना के तहत पात्र मरीज को इलाज मुफ्त मिलना चाहिए।
इलाज कर रहे डाक्टर ने खून चढ़ाने की प्रक्रिया का विवरण बेड हेड टिकट (बीएचटी) में दर्ज नहीं किया, जो आइसीयू में भर्ती मरीज के लिए अनिवार्य था। हाई कोर्ट ने कहा, ‘भले ही पैनल समिति के आदेश में विस्तृत कारण न लिखे हों, लेकिन रिकार्ड के तथ्यों का महत्व कम नहीं होता। सुनवाई के दौरान अस्पताल की ओर से पेश डाक्टर ने खुद प्रक्रियागत चूक स्वीकार की थी।’
खंडपीठ के अनुसार उपलब्ध सामग्री से योजना के क्रियान्वयन और जरूरी प्रक्रियाओं के पालन में अस्पताल की गंभीर लापरवाही दिखती है। वैसे कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैनल से हटाए जाने का मतलब यह नहीं कि अस्पताल अपनी सेवाएं बंद कर दे। वह अन्य मरीजों का इलाज जारी रख सकता है।
पीठ ने कहा, आयुष्मान योजना के तहत पंजीकरण कोई न्यायिक रूप से लागू कराने योग्य अधिकार नहीं, बल्कि चुनिंदा अस्पतालों को दिया गया विशेषाधिकार है। हालांकि राज्य को यह सुविधा बिना भेदभाव के देनी चाहिए। मामले में गंभीर कमियां मिलने के कारण कोर्ट ने हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक लाख निर्णयों का हिंदी अनुवाद पूरा
न्याय को जनभाषा में पहुंचाने की दिशा में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। पांच अक्टूबर 2026 तक हाई कोर्ट के एक लाख फैसलों का हिंदी में अनुवाद कर वेबसाइट पर निःशुल्क उपलब्ध करा दिया गया है। इस उपलब्धि पर ‘द वर्नाक्युलर वायस आफ जस्टिस’ नामक स्मारिका का विमोचन भी किया गया। यह उपलब्धि एआइ असिस्टेड लीगल ट्रांसलेशन एडवाइजरी, ई-एचसीआर और आइएलआर कमेटी के तत्वावधान में सुवास प्रकोष्ठ ने हासिल की है।
हाई कोर्ट प्रशासन की तरफ से जारी विज्ञप्ति के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली ने एक लाखवें निर्णय को स्वयं वेबसाइट पर अपलोड किया। इस दौरान न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा, न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, कमेटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अजीत कुमार, न्यायमूर्ति जस्टिस समीर जैन और न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान भी उपस्थित थे। न्यायमूर्ति समीर जैन और न्यायमूर्ति चौहान ने भी प्रतीकात्मक रूप से अपने निर्णय अपलोड किए।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सुवास सेल को बधाई दी। मुख्य न्यायमूर्ति और अन्य न्यायमूर्तियों ने इसे न्याय तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में सराहनीय कदम बताया। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। तत्कालीन सीजेआइ डा. डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर 23 जनवरी 2023 को सभी हाई कोर्ट में अनुवाद कमेटी बनाने के लिए पत्र लिखा गया था। इसके बाद 16 अगस्त 2023 को इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुवास सेल की स्थापना हुई और 23 अगस्त 2023 को पहला हिंदी अनुवाद अपलोड हुआ। 12 दिसंबर 2025 को 50 हजारवां अनुवाद पूरा हुआ था।
अभी सुवास प्रकोष्ठ सभी एएफआर निर्णय, तीन पेज से अधिक के अंतिम नान-एएफआर आदेश, उत्तर प्रदेश से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और बाम्बे व आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हिंदी अनुवाद कर रहा है। अब तक सुप्रीम कोर्ट के 9,161 फैसलों का अनुवाद कर शीर्ष अदालत को भेजा जा चुका है। अनुवाद के साथ ही कोर्ट दो ई-पत्रिकाएं भी निकाल रहा है।
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संविधान दिवस 26 नवंबर 2024 को शुरू हुई 'न्यायभा - न्याय की किरण' के सात अंक और फरवरी 2024 में शुरू हुई ऐतिहासिक निर्णय ई-पुस्तिका के छह अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें चौरी-चौरा केस, केशव सिंह केस, राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी जैसे ऐतिहासिक फैसलों के हिंदी अनुवाद शामिल हैं। ये सभी हाई कोर्ट की वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध हैं।
