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प्रयागराज में नीब करौरी बाबा का स्मृति स्थल, 'हनुमान अंश' से सुर्खियों में आया बंगला; मत्था टेकने उमड़ी भक्तों की भीड़

Published: Wed, 16 Sep 2026 01:12 AM (IST)

प्रयागराज में प्रो. सुधीर मुखर्जी का बंगला, जहां कभी नीब करौरी बाबा प्रवास करते थे, अब 'हनुमान अंश' फिल्म के ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. प्रयागराज में नीब करौरी बाबा का ऐतिहासिक स्मृति स्थल।

  2. 'हनुमान अंश' फिल्म के बाद भक्तों का तांता लगा।

  3. प्रो. सुधीर मुखर्जी के बंगले में बाबा की वस्तुएं पूजित।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। मंदिर का बोर्ड है न उसका स्वरूप। मंत्रोच्चार की गूंज भी नहीं है न कोई प्रतिमा। फिर भी लोग खिंचे चले आते हैं 18/4 चर्च लेन स्थित बंगले में। यह बंगला है प्रो. सुधीर मुखर्जी का, जहां कभी नीब करौरी बाबा प्रवास करते थे। फिल्म हनुमान अंश की चर्चा से हर कोई उनकी कृपा प्राप्ति को प्रो. सुधीर के बंगला में पहुंचकर मत्था टेकने को आतुर है।

बंगला की देखरेख करने वाले इंद्रेश प्रसाद पांडेय और उनकी पत्नी सत्या पांडेय सबका आत्मीयता से स्वागत करते हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका के पास गोमोर गांव में जन्मे सुधीर मुखर्जी की नीब करौरी बाबा से पहली मुलाकात 1935 में कोलकाता के दक्षिणेश्वर मंदिर में हुई। वहां बाबा ने उन्हें जप करने को मंत्र दिया। इसके बाद 1950 में सुधीर प्रयागराज के कनर्लगंज मुहल्ला स्थित अपने मामा के पास पढ़ने आए तो उसी वर्ष बाबा से पुन: भेंट हुई।

बाबा उनके मामा के यहां रुकते थे। आगे चलकर सुधीर मुखर्जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग में शिक्षक हो गए। बाबा की प्रेरणा से उन्होंने 1956 में चर्चलेन में बंगला बनवाया। प्रो. सुधीर के पास बाबा वर्ष में एक-दो बार जरूर आते थे, उनसे मिलने को भक्तों की भीड़ जुटती थी। फिल्म हनुमान अंश की शूटिंग बंगले में नहीं हुई, लेकिन उसमें उल्लेख होने से लोग आ रहे हैं।

शाम पांच से रात आठ बजे तक बंगले का द्वार सबके लिए खुला रहता है। यहां चढ़ावा चढ़ाने की मनाही है। भक्तों को सिर्फ दर्शन की अनुमति है। चौकी, तकिया की होती है पूजाबंगले में बाबा का विश्राम व भजन कक्ष सुरक्षित है। प्रतिदिन उसकी पूजा होती है। बाबा नीब करौरी का तख्त, उनकी तकिया पर प्रतिदिन फूल अर्पित होता है। बाबा को लौकी की सब्जी, मूंग की दाल और बेसन की रोटी का भोग लगता है, क्योंकि यह उन्हें बहुत पसंद था।

सत्या बताती हैं कि 1991 में उनका बेटा शांतनु पांडेय नैनीताल के सैनिक स्कूल में पढ़ता था। वह मिलने गई थीं। वहां हर जगह बाबा का चित्र देखकर अचंभित थीं। वहां से कैंची धाम गईं तो आश्रम की देखरेख करने वाली सत्या माई ने प्रो. सुधीर के बारे में बताया। वहां से लौटने के बाद प्रो. सुधीर से मिलीं तो उनकी पत्नी से आत्मीयता बढ़ती गई। कोई संतान ना होने के कारण प्रो. सुधीर व उनकी पत्नी कमला ने उन्हें बेटी सा स्नेह करते हुए अपने साथ रख लिया। 1997 में प्रो. सुधीर और उसके कुछ वर्ष बाद कमला की मृत्यु हो गई।

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